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Friday, July 3, 2026

वह लंबे हाथ (एक लघु कथा) —शीला बड़ोदिया

नित्य संदेश

वह लंबे हाथ

       जोर-जोर से बिजली चमक रहीं थी, तेज बारिश हो रही थी, खिड़की का दरवाजा बार-बार अंदर बाहर होकर, आवाज कर रहा था, इतने में लाइट चली गई। मम्मी, मम्मी कहां हो आप? जल्दी आकर, देखो! खिड़की के पास कोई खड़ा हैl उसके लंबे हाथ मुझे पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। बचाओ, मुझे बहुत डर लग रहा है। मालती ने जल्दी से टॉर्च ढूंढ कर जलाया और किचन से डुग्गू के कमरे की तरफ  दौड़ी। डुग्गू तुम ठीक हो ना? जैसे ही कमरे में टॉर्च का लाइट आया, डुग्गू दौड़कर, अपनी मां से चिपक गया। मम्मी वहां देखो, वहां देखो, कौन है? मुझे बहुत डर लग रहा है। मालती भी घर में अकेली थी। वरुण अभी ऑफिस से लौटा नहीं था और तेज बारिश हो रही थी, अंधेरा हो चुका था।

      मालती खिड़की की तरफ जाती है और खिड़की खोलकर बाहर की तरफ टॉर्च की लाइट में झांकती है, लेकिन उसे दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता है। डुग्गू यहां तो कोई भी नहीं है। तुमने किसको देखा? कैसा दिखाई दे रहा था? 

      डुग्गू बोला, "मम्मा, वह बहुत लंबा था, उसके दांत बड़े-बड़े थे और उसके लंबे हाथ मुझे पकड़ने मेरी तरफ आ रहे थे।" मालती चिल्लाई, कौन है? यदि कोई हो, तो सामने आओ। लेकिन कोई होता तो सामने आता, मालती को समझने में देर नहीं लगी कि डुग्गू अंधेरे में अपनी कल्पना से डर गया। उसने डुग्गू को समझाया बेटा कोई भी नहीं है।  तुमने डर के मारे, अंधेरे में जैसा सोचा, वैसा तुम्हें दिखाई दिया और तुम उससे डर गए।

       कभी-कभी हम मन में जैसा सोचते हैं, विचार करते हैं, वह हमें हमारी कल्पना में वास्तविकता जैसा दिखाई देता है। यदि हम अच्छा सोचेंगे तो हमें अच्छा और यदि हम बुरा सोचेंगे तो हमें बुरा प्रतीत होता है, इसलिए हमेशा सकारात्मक सोचना चाहिए और अंधेरे से डरना नहीं चाहिए

     डुग्गू बोला, "सॉरी मम्मी,अब मैं कोशिश करूंगा, कि मैं अंधेरे से नहीं डरूं।" "शाबाश डुग्गू, अब मैं जल्दी से खाना बना लेती हूं, तुम्हारे पापा आने ही वाले होंगे।" 



शीला बड़ोदिया

इंदौर (म.प्र.)

(लेखिका शिक्षिका हैं।)

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