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Tuesday, June 16, 2026

मुहर्रम का चांद दिखते ही आंखे अश्कबार, इमामबरगाहों में सजे आलम, सोगवारों ने पहने काले कपड़े, महिलाओं ने उतार दिए गहने

सलीम सिद्दीकी 
नित्य संदेश, मेरठ। 'बोली ज़ैनब के मेरा दिल न दुखाए कोई, मेरे अब्बास को गैरत न दिलाए कोई, मेरी चादर न उसे जा के दिखाए कोई, मेरे अब्बास को गैरत न दिलाए कोई........! सोगवारों की आंखे नम कर देने वाला मुहर्रम का महीना मंगलवार को चांद दिखते ही शुरू हो गया। 

मुहर्रम का यह सोग पूरे 2 महीने 8 दिनों तक चलेगा। इस दौरान तमाम नोहेख्वान अपने कलामों से जंग ए करबला के जांबाज़ शहीदों को खिराज ए अकीदत पेश करेंगे। चांद दिखते ही सोग का सिलसिला शुरू हो गया और तमाम सोगवारों ने काले कपड़े पहन लिए और महिलाओं ने अपने जेवरात उतार दिए। सभी इमामबारगाहों में अलम ए मुबारक सजा दिए गए। चांद दिखते ही तमाम इमामबारगाहों में मजलिसों का दौर भी शुरू हो गया। 

मुहर्रम कमेटी के संयोजक सय्यद शाह अब्बास सफवी और मीडिया प्रभारी अली हैदर रिज़वी के अनुसार दो मुहर्रम (गुरुवार) से इमामबारगाह ज़ाहिदियान से जुलूस ए ज़ुलजनाह के साथ शहर में जुलूसों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। मीडिया प्रभारी अली हैदर रिजवी ने बताया कि शहर के अलावा जैदी फार्म और लोहिया नगर स्थित विभिन्न इमामबारगाहों में कई आलिम ए दीन मजलिसों को संबोधित करेंगे। इसके अलावा अशरे तक जुलूसों का सिलसिला जारी रहेगा। 

यौम ए आशूर (10 मुहर्रम) पर शहर और ज़ैदी फॉर्म में बड़े मातमी जुलूस निकाले जाएंगे। हैदर अब्बास रिज़वी के अनुसार सेक्टर 4 स्थित शाहजलाल हॉल में कई बड़े आयोजन होंगे। इनमें मजलिसों से लेकर जुलूस और मशाल जुलूस भी शामिल हैं। यहां महिलाओं की विशेष मजलिसें से भी होंगी। 

हुमायूं अब्बास 'ताबिश' की गूंजेगी आवाज 
अपनी दमदार आवाज़ के सहारे देश-विदेशों में मेरठ की आजादारी को मकबूलियत दिलाने वाले प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय नोहाख्वान हुमायूं अब्बास 'ताबिश' के नोहों पर मेरठ के अज़ादार खूब अश्क बहाएंगे। 'महसूस न करना कभी तन्हाई सकीना', 'सकीना यह शाम ओ सहर पूछती हैं' और 'तन ए बे-सर से यह आवाज़ आती है' जैसे नोहों को आवाज़ बख्शने वाले हुमायूं अब्बास मेरठ में निकलने वाले विभिन्न मातमी जुलूसों में नोहे पढ़ेंगे। 

बता दें कि मुहर्रम के दौरान हुमायूं की मांग देश के विभिन्न हिस्सों के साथ साथ विदेशों में भी रहती है। 'एक बूंद भी पानी की अगर पाए सकीना', 'अब्बास तेरे बाद सकीना' और 'अब्बास ए बा-वफ़ा हूं मैं' जैसे दमदार नोहें पढ़ने वाले हुमायूं अब्बास कहते हैं कि उन्हें यह आवाज हुसैनियत का दर्द लोगों के दिलों तक पहुंचाने के लिए मौला ने ही बख्शी है।

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