नित्य संदेश, मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रेक्षागृह में रविवार को 'सामाजिक समरसता में गोरक्षपीठ की भूमिका' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आयोजित संगोष्ठी में संतों, विचारकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गोरक्षपीठ की समरसतापूर्ण परंपरा को एक सशक्त राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बताते हुए कहा कि इस "समरस परंपरा से ही हम एक दिन विश्व में अग्रणी बन सकते हैं।"
मंच से वक्ताओं ने गोरक्षपीठ की समरसता की परंपरा पर अपने-अपने विचार रखते हुए कहा कि जाति, पंथ और क्षेत्र की दीवारें तोड़कर जब समाज एक सूत्र में बंधता है, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है। गोरक्षपीठ की सदियों पुरानी समरसता परंपरा इसी मंत्र की गवाह है। यह परंपरा केवल ताकत की बात नहीं करती, यह समाज को संस्कारों की नींव पर खड़ा कर सशक्त बनाती है। इसी राह पर चलकर भारत फिर से विश्वगुरु का सिंहासन हासिल कर सकता है। रविवार को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रेक्षागृह में राष्ट्रीय संगोष्ठी “सामाजिक समरसता में गोरक्षपीठ की भूमिका” का यह उद्घोष गूंजा। गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज की असीम अनुकंपा और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्य स्मृति को समर्पित यह आयोजन किया गया था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रवींद्रपुरी जी महाराज ने हुंकार भरी कि भारत की संत परंपरा ने हमेशा खंडित समाज को जोड़ने का काम किया है। गोरक्षपीठ ने सेवा और समर्पण से समरसता की उस मशाल को जलाए रखा है जो अंधेरे को चीरती है। राष्ट्रसंत अवेद्यनाथ जी महाराज का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता के शिखर तक पहुंचने का रास्ता समाज के अंतिम व्यक्ति के द्वार से होकर गुजरता है।
सनातन का प्राण है समरसता: स्वामी दीपांकर
मुख्य अतिथि आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर जी महाराज ने दो टूक कहा कि सनातन को किताबों में मत ढूंढो, समरसता ही उसका प्राण है। उन्होंने चेताया कि जातीय और वैचारिक विभाजन की आग में राष्ट्र स्वाहा हो जाएगा। समय की मांग है कि हम सब राष्ट्रधर्म की वेदी पर एकजुट हों। अपनी भिक्षा यात्रा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत संसद में नहीं, गांव की उस चौपाल में बसती है जहां सब एक साथ बैठते हैं।
अंतिम व्यक्ति को गले लगाना ही राष्ट्रधर्म: पदम सिंह
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचार प्रमुख पदम सिंह जी ने साफ कहा कि समरसता कोई भाषण का विषय नहीं, यह राष्ट्र निर्माण की पहली शर्त है। गोरक्षपीठ ने उस वंचित को गले लगाया जिसे सदियों से धक्के दिए गए। यही गोरखपुर मॉडल आज पूरे देश के लिए आदर्श है। जब तक अंतिम पंक्ति का व्यक्ति मुख्यधारा में नहीं आएगा, तब तक विकास का दावा खोखला है। “समरसता संवाद” कोई इवेंट नहीं, समाज की टूटी कड़ियों को जोड़ने का महायज्ञ है। प्रयागराज से शुरू हुई यह यात्रा अब जन-जन का आंदोलन बन चुकी है। गोरक्षपीठ की परंपरा को घर-घर पहुंचाना ही हमारा संकल्प है।
समरसता योद्धा सम्मानित
संगोष्ठी में महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के राष्ट्रवादी अवदान को भी याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि सामाजिक न्याय सिर्फ संविधान की धारा नहीं, जन-जन के व्यवहार में उतरना चाहिए। कार्यक्रम में समाज को जोड़ने वाले 25 समरसता योद्धाओं को “समरसता सम्मान” से नवाजा गया।
राष्ट्रसंत अवेद्यनाथ जी महाराज के आदर्शों को गांव-गांव पहुंचाने के संकल्प के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ। मेरठ से उठी यह आवाज अब पूरे देश में गूंजेगी और समरसता से ही सशक्त राष्ट्र बनेगा।
—अशोक सोम
(लेखक: दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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