— सुरेश पचौरी
पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास याने मां भारती के एक ऐसे उपासक जिनके यश की धवल पताका आज भी दिग् दिगंत तक लहरा रही है। वे भारतीय ज्ञान परम्परा के ऐसे साधक थे, ज्योतिष शास्त्र के ऐसे उपासक थे, साहित्य जगत के ऐसे जाजवल्यमान सितारे थे, जिन्होंने महाकवि कालिदास की नगरी उज्जयिनी की अस्मिता में चार चांद लगाए। अपने बहुआयामी व्यक्तित्व से उन्होंने ज्योतिष, इतिहास, संस्कृत, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में समान रूप से अपना अमूल्य अवदान दिया। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय ज्ञान-विज्ञान, प्राचीन विरासत, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्र चेतना के संरक्षण के लिए समर्पित था।
पंडित सूर्यनारायण व्यास का प्रभामंडल बहुत विशाल था। वे एक सुविख्यात ज्योतिषाचार्य तो थे ही, साथ ही एक प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, उच्च कोटि के साहित्यकार, इतिहासकार, पुरातत्व विद् और राष्ट्रवादी विचारक थे। वे इतने महान ज्योतिषी थे कि भारत की आजादी के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के आग्रह पर उन्होंने आजादी की के सटीक समय की गणना की थी। उन्होंने महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, मदन मोहन मालवीय जैसी विभूतियों के ग्रह-दशा की गणना कर प्रचुर प्रसिद्धि प्राप्त की थी। वे भारत के भविष्य को लेकर समय-समय पर जो भविष्यवाणियां करते थे, वे विल्कुल सटीक होती थी।
ज्योतिष के क्षेत्र में उनका ज्ञान इतना विशद् था कि देश-विदेश के लोग अपना भाग्य जानने के लिए उनके पास पहुंचते थे। वे कोई पेशागत ज्योतिषी नहीं थे बल्कि ज्योतिष उनके लिए जन कल्याण का माध्यम था। इस विद्या के द्वारा वे 'सर्वजन सुखाय' की भावना से साकार रूप देते थे। उनके द्वारा की गई तमाम भविष्यवाणियों ने उन्हें प्रसिद्धि के उच्चतम शिखर तक पहुंचाया। उन्होंने ज्योतिष को खगोल, गणित और भारतीय परम्पराओं से जोड़कर सर्जनात्मक दृष्टिकोण अपनाया। ज्योतिष शास्त्र पर लिखे गये उनके तमाम शोधपरक आलेखों से वे ज्योतिष मनीषियों के बीच सदैव आदरणीय रहे। उनके ज्योतिषीय ज्ञान को पूरी दुनिया में सराहा गया, अंगीकार किया गया। उन्होंने ज्योतिष को केवल भविष्यवाणी तक सीमित न रखकर उसे जीवन मूल्यों से जोड़कर विस्तारित किया।
उज्जैन, जिसकी सदियों से एक धार्मिक नगरी के रूप में पहचान रही, को सांस्कृतिक पहचान दिलाने में पंडित सूर्यनारायण व्यास का उल्लेखनीय योगदान रहा। चाहे विक्रम विश्वविद्यालय की स्थापना हो, चाहे विक्रम कीर्ति मंदिर जैसे सांस्कृतिक केन्द्र का विकास हो या फिर कालिदास समारोह का शुभारंभ हो, पंडित व्यास जी के सहयोग व समर्थन से ही इन संस्थानों को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। उसके प्रण-प्राण में उज्जैन रचता-बसता था। उन्होंने उज्जैन को वैश्विक मानचित्र पर एक सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में स्थापित किया। कालांतर में वे भगवान महाकालेश्वर की नगरी के पर्याय बन गये। उन दिनों चंडित सूर्यनारायण व्यास जी की विद्वता का डंका बजता था। देश के बड़े-बड़े राजनेता, ख्याति लब्ध साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी, कवि, लेखक, पत्रकार पंडित व्यास जी से मिलने के लिए उनके निवास पर पहुंचते थे। उनकी विद्वता इतनी जगजाहिर थी कि दुनिया भर के लोग इनसे परामर्श लेने के लिए आते थे। व्यास जी का व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि कोई व्यक्ति अगर एक बार उनसे मिल लेता था तो वह कभी उन्हें भूल नहीं सकता था।
मेरा सौभाग्य है कि अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत में भोपाल के जननेता डॉ. शंकर दयाल शर्मा, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, के साथ पंडित व्यास जी के दर्शन व उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का मुझे अवसर प्राप्त हुआ। भौतिक रूप से पंडित सूर्यनारायण व्यास जी आज दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में की गई सामाजिक सेवाएं सदियों तक उन्हें याद की जाती रहेगी। प्रसन्नता की बात है कि पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास जी के सुपुत्र विद्वान मनीषी श्री राजशेखर व्यास जी अपने पूज्य पिता जी की अमूल्य विरासत के साथ संजोए हुए हैं और उनकी पावन स्मृति को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए सतत् सन्नद्ध रहते हैं। मां सरस्वती के अनन्य उपासक गोलोकवासी पंडित सूर्यनारायण व्यास जी की पचासवीं पुण्य तिथि पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए विनम्र नमन करते हैं।
(लेखक भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं)
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