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Saturday, June 20, 2026

पहला हार्ट अटैक (एक संस्मरण) — शीला बड़ोदिया

नित्य संदेश 

पहला हार्ट अटैक 

  ‌‌  तब कीपैड वाले फोन का चलन था, शाम को मेरा फोन बजा, पापा ने कहा "मेरी तबियत खराब है, भाई को लेकर जल्दी वैशाली नगर चौराहा डॉ व्यास के यहां आ जाओ।" मैंने पूछा," क्या हुआ पापा?" बोले, बस तुम लोग जल्दी आ जाओ। भाई ने फटाफट बाइक निकाली। 5 मिनट में हम डॉ व्यास के क्लिनिक पहुंच गए। डॉ बोले, "जल्दी! आपके पापा को एम वाय ले जाकर एडमिट करो, इन्हें अटैक आया है।" हम स्तब्ध रह गए, "पापा कैसे, कब आया? पापा बोले "बस में, अब जल्दी चलो।" मैंने कहा पास ही के हॉस्पिटल चलते हैं, डॉ बोले मैं महाराजा यशवंतराय होल्कर हॉस्पिटल का ह्रदय विभाग का हेड हूँ, मैं कॉल कर देता हूं,अच्छा इलाज हो जाएगा,आप जल्दी ले जाओ।" 


        पापा के चेहरे पर कोई डर,घबराहट नहीं थी।वे बस से अकेले क्लिनिक तक पैदल आए,गजब की हिम्मत थी, उनमे। किसी व्यक्ति को अटैक का पता चले तो टेंशन में व्यक्ति मर जाता है। ऑटो ढूंढ़ने में समय खराब होता, तो हम पापा को बाइक पर बैठाकर ही ले गए। 


     शांत भाव से हमारे साथ बाइक पर बैठ गए। मुझे पता था,  मेरे पापा बहुत हिम्मत वाले हैं। ईश्वर से प्रार्थना कर रहीं थीं, सही समय पर हॉस्पिटल पहुंच जाये, पापा से भी बात कर रहीं थीं, पापा कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जाएगा। मेने मामा को फोन लगा कर सारी बात बता दी, वे भी हॉस्पिटल के लिए निकल गए थे।

     

        हॉस्पिटल पहुंचकर, हमनें जब काउन्टर पर बताया, डॉ व्यास ने भेजा है पापा को अटैक आया है , जल्दी ही वार्ड बॉय को व्हील चेयर लेकर बुलाया पर किस्मत जैसे पापा की परीक्षा ले रहीं थीं, पापा बैठने को हुए कि चेयर टूट गयी।पहले तो हम उन्हें बाइक से लेकर आए, अब चेयर भी। पापा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, कि  उन्हें कोई परेशानी  है। बोले, मैं चल लूँगा, चलो। 

       

     पापा को लिफ्ट से लेकर हम आई सी यू में पहुचें। डॉक्टर ने उन्हें बेड पर लिटाया और सारे जरुरी उपकरण लगा दिये। तब मैने चैन की सांस ली,पर जल्दी ही डॉक्टर ने बुलाया कहा कि ये मेडिसिन और इन्जेक्शन जल्दी लाएl उन्होंने बताया कि ये इन्जेक्शन 3000 का है और जल्दी से जल्दी लगना जरुरी है। यदि आप चाहें तो हमारे पास भी है या आप खरीद कर ला दें। हमने डॉक्टर को कहा, आप ही जल्दी से लगा देl  वे बोले हम एसे नहीं लगा सकते, इसमें रिस्क है, कुछ भी हो सकता है, वेसे रिस्क के चांस  कम है, पर आपको पहले पेपर साइन करने होंगे। 


     मामा आ चुके थे, मुझे थोड़ी हिम्मत मिली, पर पेपर मुझे ही साइन करने थे, क्योंकि मैं ही मरीज के परिवार से बड़ी थी।   मेरे हाथ काँप रहे थे, पापा को कुछ हो गया तो मैं सबको क्या जबाव दूंगी। फिर मैंने सोचा कि मैं हिम्मत  नहीं हार सकती,कुछ नहीं होगा पापा  को,कुछ नहीं होगा। मैने ईश्वर से प्रार्थना की,मैं जैसे पापा को लायी, वैसे ही घर ले जाऊँ,इतनी कृपा करना। पेपर साइन  करते ही डॉक्टर ने इन्जेक्शन  लगाया और कहा आज की रात रिस्की हैं,  माइनर अटैक है फिर भी ध्यान रखना होगा। तब तक मामा, मासी,बुआ के बेटे आ चुके थे,सब पापा से मिले। सभी को हँसते हुए बोले, मैं ठीक हूं, चिंता न करे। पापा ने मम्मी के बारे में पूछा, मम्मी को बता दिया कि सांस लेने में थोड़ी तकलीफ हो रहीं थीं,सिगरेट ज्यादा पीते हैं ना इसलिए।  कल डिस्चार्ज कर देंगे । सभी को सच बताने के लिए मना कर दिया, नहीं तो मम्मी को सम्भालना मुश्किल होता।


    पापा को इन्जेक्शन लग चुका था, वो तो पहले ही नॉर्मल थे, अब भी। तीनों भाई खाना खाने चले गए,मामा भी घर चले गए। और मैं बहुत सारी हिम्मत बांधे पापा के पास बैठी थी। उनके पास तो कोई डर था ही नहीं। हंसते हुए बोले, "जा शैला सो जा कुछ नहीं हुआ, मैं ठीक हूँ।" मेरे दिमाग में डॉक्टर की बात घूम रहीं थीं, कि आज की रात रिस्की है। मैं रात भर उन्हें देखती रही,और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करती रही।  पापा के चेहरे  पर रौनक थी, न कोई चिंता, न भय,जैसे कुछ हुआ ही ना हो। सुबह 4 बजे के बाद पापा को नींद आने लगी। डॉक्टर बोले अब ठीक हैं, चिंता की बात नहीं,तो मेरी आँखों में आंसू आ गए। ईश्वर को धन्यवाद कहा।  रात भर उन्हें देखती रहीं, कभी रोना भी आया तो उनके सामने नहीं रोई,उनमें बहुत हिम्मत थी, पर मैं उसे तोड़ना नहीं चाहती थी। सुबह तो सब लोग आ चुके थे, 4 दिन बाद पापा ठीक हो घर आ गये थे।


      तब हमनें पूछा आपको बस में अटैक आया, बिना बताए डॉक्टर के पास भी चले गए, हमे बताना चाहिए था। पापा बोले "मैं फोन लगा कर बताता तो तुम सब कितना घबरा जाते, शांति से सब समस्या का हल निकलता है, अब सब ठीक हो गया।"

       उनसे  हमने विकट परिस्थितियों में भी धैर्य रखने का सबक सीखा।


— शीला बड़ोदिया

इंदौर

(लेखिका शिक्षिका हैं)

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