"रणभेरी - छह शस्त्र, एक सिंहनाद"
बजा दे रणभेरी! उठा दे तूफान!
आज किस्मत से जंग का, कर दे ऐलान!
छह शस्त्र तेरे हाथ, छहों में प्रलय-धार,
एक हुंकार से कांपे, ये सारा संसार!
1-(ज) पहला शस्त्र "जेब" का, ये खजाना नहीं खून है,
स्वाभिमान की तलवार, ईमान का जुनून है।
न झुकेगा माथा, न बिकेगा जमीर,
भूखा शेर भी घास न खाए, यही है वीर।
खाली जेब का कायर, युद्ध से पहले मरे,
भरी जेब का बाज, गिद्धों को चीर धरे!
2-(ज) दूसरा शस्त्र "जबान" का, ये वज्र की ललकार,
एक बोल से सिंहासन हिले, एक बोल से चले कटार।
सच की जबान गरजे, तो बिजली भी थर्राए,
झूठ की जबान कांपे, तो धरती भी दरक जाए।
सिंह-सी दहाड़ मार, जब रण में बात आए,
मौन का कफन ओढ़े, वो कायर कहलाए!
3-(ज) तीसरा शस्त्र "जूता" है, ये लोहा है तपता,
अंगारों पर चलकर भी, ये कदम न पीछे हटता।
AC की कब्रों में जो सोए, वो मुर्दे कहलाएं,
धूप में जो खून बहाएं, वही इतिहास बनाए।
एक-एक कदम में शोले, एक-एक ठोकर में भूकंप,
तेरा जूता जब चले, तो कांपे दुश्मन का कंप!
4-(ज) चौथा शस्त्र "जिगर" का, ये मौत का काल है,
यम भी इससे डर जाए, ऐसा ये महाकाल है।
धमकी की आंधी आए, तो तू बन जा प्रचंड,
तूफान से टकरा जा, बन जा तू महादंड।
कायर सौ बार जलें, वीर एक बार धधके,
जिगर में ज्वालामुखी रख, फिर देख कौन भड़के!
5-(ज) पांचवां शस्त्र "जूनून" है, ये पागलपन की ज्वाला,
इसके बिना चारों शस्त्र, मिट्टी के हैं प्याला।
दीवाना बन रण का, दुनिया चीखे तो चीखे,
जूनून की तलवार से, पहाड़ों के सीने चीरे।
भगत-कलाम-शिवाजी, सब जूनून से जीते,
तू भी रणचंडी बन, फिर देख किस्मत रीते!
6-(ज) छठवां शस्त्र "जिम्मेदारी", ये मुकुट है शीश का,
कुर्सी मिली तो भूल न जाना, दर्द किसी गरीब का।
जिसने लहू से सींचा, समाज का हर खेत,
वही अमर हुआ जग में, बाकी सब रेत।
जीत का सेहरा बांध, पर दर्द को गले लगा,
जिम्मेदार की हुंकार से, कांपे दुश्मन का तगमा!
उठ! उठ रे मतवाले! बजा दे तू रणढोल,
जेब में ईमान का खंजर, जबान पे सच के बोल।
जूते में शोले बांध, जिगर में महाकाल,
जूनून की मशाल ले, जिम्मेदारी की ढाल।
जेब, जबान, जूता, जिगर, जूनून, जिम्मेदारी,
छहों शस्त्र चमका दे, बन जा प्रलयंकारी!
फिर देख ऐ सिंह! कैसे झुकेगा ये जहान,
तेरे कदमों में होगा, विजय का अभिमान!
हुंकार भर! ललकार भर! गूंजे धरती-आसमान,
छ: ज वाला महायोद्धा, जीता हर मैदान!
मेरठ से दिल्ली तक, एक ही नाम गूंजे,
अशोक का रण-सोम, दुश्मन का काल दूजे!
कवि: अशोक सोम

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