सपना सी.पी.साहू
नित्य संदेश, इंदौर-भोपाल। उर्दू अदब के सबसे मकबूल और अजीम शायरों में शुमार पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। वे 91 वर्ष के थे। उनके चले जाने से शायरी की महफिलें सूनी हो गई हैं और हिंदी-उर्दू साहित्य के एक सुनहरे युग का अंत हो गया है।
बशीर बद्र साहब ने उर्दू शायरी को भारी-भरकम और क्लिष्ट शब्दों के बोझ से निकालकर आम आदमी की बोलचाल और रोजमर्रा के अहसासों से जोड़ा था। यही वजह थी कि उनका हर एक शेर सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाता था।
वे लंबे समय से डिमेंशिया (स्मृति लोप) की बीमारी से अस्वस्थ चल रहे थे, जिसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही देश और दुनिया के साहित्यिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई है। देश के शीर्ष साहित्यकारों, कवियों, शायरों और उनके करोड़ों प्रशंसकों ने नम आंखों से उन्हें याद किया।
बद्र साहब की यादों और जिंदगी के फलसफे को बयां करता उनका यह बेहद मशहूर शेर आज हर किसी की जुबां पर है।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
अयोध्या में हुआ था जन्म, पिता थे पुलिस विभाग में
सय्यद मुहम्मद बशीर (डॉ. बशीर बद्र) का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या (फ़ैज़ाबाद) में हुआ था। वे एक सम्मानित मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता सैय्यद मोहम्मद नजीर पुलिस विभाग में असिस्टेंट अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे, जबकि उनकी माता का नाम आलिया बेगम था। बद्र साहब बचपन से ही बेहद कुशाग्र बुद्धि और संवेदनशील थे। उन्होंने महज सात वर्ष की अल्पायु में अपना पहला शेर लिखा था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए, एमए और फिर पीएचडी (Ph.D.) की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने इसी विश्वविद्यालय और बाद में मेरठ कॉलेज में लंबे समय तक प्राध्यापक के रूप में सेवाएं दीं।
वर्ष 1987 में मेरठ दंगों के दौरान उनका घर और उनकी अनमोल साहित्यिक कृतियां जलकर खाक हो गईं, जिसके बाद वे हमेशा के लिए भोपाल आ गए।
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”
भोपाल में उनके साथ उनका परिवार रहा, जिसमें उनकी धर्मपत्नी डॉ. राहत बद्र और उनके सुपुत्र तैयब बद्र व मशहूर गीतकार नुसरत बद्र शामिल हैं।
इंसानी रिश्तों की पेचीदगियों और मजबूरियों को उन्होंने जिस सादगी से कागज़ पर उकेरा, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। जब भी समाज में रिश्तों में दूरियां या मजबूरियां आईं, दुनिया ने बद्र साहब के इस अमर शेर का सहारा लिया।
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
नफरत के दौर में मोहब्बत का पैगाम
बशीर बद्र केवल मोहब्बत के ही शायर नहीं थे, बल्कि वे समाज के बदलते मिजाज और इंसानी व्यवहार के भी बहुत बड़े पारखी थे। उन्होंने मुशायरों के मंच से हमेशा भाईचारे और सलीके की बात की। दुश्मनी में भी एक शराफत और लिहाज बाकी रखने की उनकी नसीहत आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो जाती है।
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”
शहरों की बदलती आबोहवा, संवेदनहीनता और अजनबी होते जा रहे इंसानी मिजाज पर तंज कसते हुए उन्होंने लिखा था।
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”
डॉ. बशीर बद्र को उनकी अप्रतिम साहित्यिक सेवाओं के लिए भारत सरकार द्वारा 'पद्मश्री' (1999) और 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' सहित दर्जनों राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया था। उनकी लिखी गज़लें और शेर हमेशा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे और अदब के दीवानों को हौसला देते रहेंगे।
“मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात हो जाए।”
भले ही आज बद्र साहब शारीरिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन अपनी गज़लों, नज़्मों और जादुई लफ़्ज़ों के ज़रिए वे हमेशा शायरी के चाहने वालों के दिलों में धड़कते रहेंगे।
“जब भी कश्ती किसी साहिल पे लगा देती है,
मुझको इक भूली हुई याद रुला देती है।”
उर्दू अदब के इस अजीम फनकार और शब्दों के जादूगर को नित्य संदेश परिवार व सम्पूर्ण साहित्य जगत की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि!

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