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Wednesday, May 6, 2026

माउंट आबू में भारतीय संस्कृतियों का संगम:पत्रकारिता की दशा, दिशा और चुनौतियों पर राष्ट्रीय मंथन

नित्य संदेश। माउंट आबू( राजस्थान के आबूराज)में 30 अप्रैल से 4 मई के बीच नेशनल कांफ्रेस का आयोजन किया गया। नेशनल कांफ्रेस का मुख्य विषय वर्तमान दौर में निष्पक्ष पत्रकारिता के साथ विश्व शांति के लिए किस तरह से पत्रकार देश को विश्वगुरु बनाने में योगदान दे सकते हैं। राजस्थान का यह एकमात्र हिल स्टेशन माउंट आबू सिर्फ पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि वैचारिक मंथन के लिए भी जाना जाता है। यहां ब्रह्माकुमारीज संस्थान के शांतिवन परिसर में प्रतिवर्ष 'राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन' का आयोजन होता है। इस बार का विषय था 'स्वर्णिम भारत के निर्माण में मीडिया की भूमिका एवं वर्तमान पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां। 



1.विविधता में एकत,आपसी संवाद: भाषा अनेक, भाव एक।   
आयोजित राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन की सबसे बड़ी खूबसूरती रही की विविधता में एकता। जिसमें तमिलनाडु के पत्रकार ने जब अपनी समस्या रखी तो पंजाब के साथी ने तुरंत सहमति जताई। वहीं यूपी के पत्रकारों ने भी वर्तमान दौर की पत्रकारिता एवं सोशल मीडिया को लेकर अपने-अपने विचार मंच से साझा किए। डिजिटल युग का दबाव, क्षेत्रीय मीडिया की ताकत और फील्ड रिपोर्टर की साझा पीड़ा पर खुलकर चर्चा हुई। जिसमें मंच पर उपस्थित मंचासीन अतिथियों ने तालियों की गडगडाहट के बीच पत्रकार साथियों का उत्साह वर्धन किया। लेकिन वर्तमान दौर की जटिल होती जा रही पत्रकारिता पर कुछ साथियों ने अपने विचार रखते हुए मंच पर आसीन सरकार के प्रतिनिधियों से कुछ अपेक्षाएं भी रखी की सरकार भी पत्रकारों के कुछ हितों का ध्यान रखे,इस मुद्दे पर कुछ ने इस तरह के मुद्दों का खुलकर समर्थन किया,कुछ यह कहते हुए सुने गए कि निष्पक्ष एवं सकारात्मक पत्रकारिता सभी को चाहिए लेकिन पत्रकार हित की अवाज उठाना बडा मुश्किल है।  


2.वर्तमान दौर की पत्रकारिता:किस मोड़ पर खड़े हैं हम?  
 मंच से बोलते हुए कुछ वक्ताओं ने स्वीकार किया कि पत्रकारिता 'पत्रकारिता 3.0' के दौर से गुजर रही है। स्पीड ने विश्वसनीयता को पीछे छोड़ दिया है। यहां तक की अब तो 'गोदी मीडिया' बनाम 'विपक्षी मीडिया' तक का टैग लगने से निष्पक्ष रहना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

 
3. राज्य सरकारों का रवैया : सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू  
राजस्थान, छत्तीसगढ़, ओडिशा,जैसे राज्य पत्रकार सुरक्षा कानून लाकर सकारात्मक पहल कर रहे हैं। वहीं कई बड़े राज्यों में सरकार की आलोचना पर विज्ञापन बंद करना,एफआईआर दर्ज करना और 'पसंदीदा' पत्रकारों को ही एक्सेस देना 'अघोषित सेंसरशिप' बन गया है।


4. वरिष्ठ पत्रकार अशोक सोम ने रखी बेबाक बात : 
'निष्पक्ष पत्रकारिता के सामने चुनौतियां अपार' सम्मेलन के दूसरे दिन मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार अशोक सोम ने निष्पक्ष पत्रकारिता की चुनौतियों पर बेहद बेबाकी से अपने विचार रखे। 'सुरक्षा' 'का' 'अभाव' 'और' 'सामाजिक' 'बहिष्कार': सोम जी ने कहा कि पहले पत्रकार को समाज 'चौथा स्तंभ' मानकर इज्जत देता था। अब सरकार के खिलाफ लिखो तो 'देशद्रोही' और विपक्ष के खिलाफ लिखो तो 'बिका हुआ पत्रकार तक बोल दिया जाता है। ऊपर से ग्रामीण इलाकों में खनन और शराब माफिया की खबर छापने पर जान का खतरा अलग। "पत्रकार न घर का रहता है न घाट का।"


5. 'डिजिटल' 'मीडिया' 'की' 'आड़' 'में' 'पीत' 'पत्रकारिता': 
उन्होंने चिंता जताई कि कि यूटयूब पर 10 हजार में चैनल खोलकर बिना प्रशिक्षण के लोग 'पत्रकार तक बन गए हैं। ये 'पेड न्यूज' को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे असली पत्रकारों की साख गिर रही है। "5 हजार लेकर किसी को बदनाम कर दो, 10 हजार लेकर महान बना दो - ये पत्रकारिता नहीं, दलाली है।"


6. 'पाठक' 'भी' 'जिम्मेदार': 
अशोक सोम ने कड़वा सच बोला कि आज का पाठक भी 'वही सुनना चाहता है जो उसकी विचारधारा से मेल खाता हो'। निष्पक्ष खबर पर व्यूज नहीं आते। टीआरपी के लिए मजबूरी में चैनलों को 'डिबेट का अखाड़ा' बनाना पड़ता है। "जब तक जनता निष्पक्ष खबर को सपोर्ट नहीं करेगी, पत्रकार अकेला क्या लड़ेगा?"
उनका समाधान:वक्ताओं ने कहा कि कलम की कीमत' वापस लानी होगी। इसके लिए 3 चीजें जरूरी हैं - 1. पत्रकारों के लिए यूनिवर्सल पेंशन और बीमा, ताकि वो डरकर न लिखे। 2. मीडिया हाउस के मालिकाना हक में पारदर्शिता, ताकि जनता को पता हो कि चैनल किसका है। 3. मीडिया लिटरेसी को स्कूल के कोर्स में शामिल करना, ताकि अगली पीढ़ी खबर और प्रोपेगेंडा में फर्क कर सके।


7. पत्रकारिता का स्तर और आगे का रास्ता  
सम्मेलन का निष्कर्ष था कि चुनौतियां हिमालय जैसी हैं, पर हौसला भी एवरेस्ट जैसा है। 'एडिटर्स गिल्ड' को मजबूत करना, 'पब्लिक फंडेड मीडिया' का मॉडल अपनाना और जनता को मीडिया लिटरेसी सिखाना ही आगे का रास्ता है।


निष्कर्ष : अंधेरे में दीपक की लौ  
माउंट आबू के इस संगम ने साफ किया कि पत्रकारिता मर नहीं रही, 'कसमसा' रही है। जब तक अशोक सोम जैसे वरिष्ठ पत्रकार और फील्ड के युवा रिपोर्टर सवाल पूछने को जिंदा हैं, लोकतंत्र जिंदा है। सम्मेलन का समापन 'संकल्प गीत' से हुआ - "न दबेंगे, न बिकेंगे, कलम के सिपाही सच ही लिखेंगे"।



अशोक सोम

लेखक: दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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