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Friday, May 1, 2026

उनवान:- पास होकर भी दूर है... लेखक- साजिद अली सतरंगी की एक कहानी


नित्य संदेश
 

पास होकर भी दूर है

ज़िन्दगी क‌ई बार इम्तिहान लेती है, कभी अपनों को दूर कर के तो कभी पास आकर। शादी को अभी सिर्फ़ चंद महीने गुज़रे थे। घर की दीवारों पर अभी तक नई खुश्बू बाकी थी, तकियों पर दुल्हन की मेहंदी की हल्की-हल्की महक ठहरी हुई थी,ओर दीवारें उसकी आमद से चमक रही थी। ड्राइंग रूम के एक कोने में पड़े सोफे पर रखा उसका दुपट्टा अब भी ऐसे पड़ा था, जैसे अभी दरवाज़ा खुलेगा और वो मुस्कुराते हुए कहेगी, “मैं आ गई।”

"मगर दरवाज़ा नहीं खुला"।

वो अपने मायके गई थी--बामुश्किल दो-तीन दिनों के लिए। जाते वक़्त उसने हँसते हुए कहा था,,

“ज़्यादा याद मत करना, जल्दी आ जाऊँगी।” 

उसका घर से इस तरहां विदा होना उसकी मुहब्बत की गवाही दे रहा था।

शौहर ने भी मुस्कुरा कर सिर हिला दिया था, मगर उसे क्या मालूम था, कि दो-तीन दिन, पूरे दो हफ़्तों में बदल जाएँगे।

शुरुआत के दो दिन तो बड़े अच्छे गुज़रे।उसका सुबह का "सलाम,, दोपहर में दो-चार बातें, रात को लंबी कॉल। ऐसा लगता था जैसे दूरी सिर्फ़ जिस्मों की है, दिल अब भी पास हैं। दिन गुजरते ग‌ए मगर फिर धीरे-धीरे सब बदलने लगा।

सुबह मैसेज आता, “आज बहुत काम है।”

दोपहर में, “मेहमान आए हुए हैं।”

रात को, “बहुत थक गई हूँ, कल बात करेंगे।”

और फिर “कल” कभी आता ही नहीं था।

शौहर हर बार मोबाइल स्क्रीन को ऐसे देखता जैसे उसमें कोई जवाब छुपा हो। जब ऑनलाइन आती तो दिल धड़क उठता, लेकिन दो मिनट बाद ऑफलाइन हो जाती। स्टेटस अपडेट तो हो जाता, मगर उसके मैसेज का जवाब नहीं आता।

दिल के अंदर अजीब-अजीब ख़्याल आने लगे।

“क्या मैं उसके लिए इतना ज़रूरी नहीं?”

“क्या शादी के बाद भी उसकी दुनिया वही है,, जिसमें मेरे लिए जगह अभी बनी ही नहीं?”

“या शायद मैं ही ज़्यादा उम्मीदें बाँध बैठा हूँ?” 

कुछ इस तरह की अनसुलझी सी कहानी दिल लिखने लगा।

रात को बिस्तर पर लेटते हुए उसे कमरे की ख़ामोशी काटने लगती। वो तकिये का दूसरा हिस्सा देखता, जो चंद दिनों पहले ही उसकी मौजूदगी से महक रहा था मगर अब बिल्कुल तन्हा था। एक अज़ीब सा पागलपन, कभी उसका दुपट्टा उठाकर सीने से लगा लेता, कभी उसकी तस्वीर को देर तक निहारते रहता।

उसे गुस्सा भी आता।

कभी दिल करता कि मैसेज करें,,

“अगर इतना ही बिज़ी रहना था तो शादी क्यों की?” कुछ इस तरह के सवालात,,,

मगर अगले ही पल उसका मासूम चेहरा आँखों के सामने आ जाता,, और वो सब गिले-शिकवे मिटा देता। मैंने इन चंद दिनों के सफ़र में यह महसूस किया है,,,

"मुहब्बत अक्सर इंसान को लड़ना नहीं, सहना सिखा देती है"।

एक रात की बात है, उसने बहुत इंतज़ार किया। घड़ी में बारह बज चुके थे। उसने आख़िरी बार मोबाइल देखा--ना कॉल, ना कोई मैसेज।

"दिल भारी हो गया"।

उसने सिर्फ़ इतना लिखा:--

“उम्मीद है तुम ठीक हो।”

"मैसेज सीन हुआ, मगर जवाब नहीं आया।,,

उस रात वो देर तक छत को देखता रहा। दिल में अजीब सा खालीपन था। उसे महसूस हुआ कि शादी सिर्फ़ साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि एहसास दिलाने का नाम भी है कि,,,,,

“तुम मेरे लिए अहम हो।”

अगली सुबह जब उसकी आँख देर से खुली। टेबल पर रखा मोबाइल हाथ में लिया तो एक लंबा मैसेज पड़ा था।

“मुआफी चाहूंगी। मुझे पता है मैं तुम्हें वक़्त नहीं दे पा रही। यहाँ आते ही अम्मी की तबीयत अचानक ख़राब हो गई। घर के सारे काम,, रिश्तेदार, दवाईयाँ,सब कुछ एक साथ आ गया। हर बार सोचती हूँ तुम्हें कॉल करूँ, मगर इतनी थक जाती हूँ कि हिम्मत साथ नहीं देती। मगर इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि तुम मेरे लिए अहम नहीं हो। सच कहूँ, हर काम के बीच तुम्हारी बहुत याद आती है। बस मैं ठीक से बता नहीं पाई।”

शौहर देर तक उस मैसेज को पढ़ता रहा।

उसके दिल में जो गिले थे, उसका मैसेज पढ़कर धीरे-धीरे पिघलने लगे।

उसे एहसास हुआ, कभी-कभी हम सामने वाले की ख़ामोशी को अपनी कमी समझ लेते हैं, जबकि वो अपनी लड़ाइयों में उलझा हुआ होता है।

उसने जवाब लिखा:-

“मुझे सिर्फ़ इतना चाहिए था कि तुम मुझे अपने हाल में शामिल रखो। मैं शिकायत नहीं करता, बस तुम्हारी कमी महसूस होती है।”

उधर से तुरंत रिप्लाई आया:-

“तुम्हारी यही बात मुझे तुम्हारे और क़रीब ले आती है।”

उस दिन पहली बार दोनों ने खुलकर बात की। कोई शिकवा नहीं, कोई इल्ज़ाम नहीं—सिर्फ़ दिल की बातें।

शाम को वीडियो कॉल पर वो मुस्कुराई। आँखों के नीचे हल्की थकान थी, मगर चेहरे पर वही अपनापन।

उसने कहा,,

“जानते हो, मायका कितना भी प्यारा हो, अब सुकून तुम्हारे साथ जुड़ गया है।”

ये सुनकर शौहर के चेहरे पर महीनों बाद सुकून जैसी राहत आई।

उसे समझ आ गया कि रिश्तें सिर्फ़ पास रहने से मज़बूत नहीं होते, बल्कि एक-दूसरे की मजबूरियाँ को समझने से मज़बूत होते हैं। एक बात हमेशा याद रखें 

मुहब्बत में अक्सर दूरी नहीं मारती, बल्कि ख़ामोशी मारती है।

अगर बात होती रहे, एहसास ज़िंदा रहे, तो फ़ासले भी रिश्ता नहीं तोड़ पाते।

दो दिन बाद वो वापस आई।

घर के कमरे का वही दरवाज़ा खुला, वही कदमों की आहट आई, वही मेहंदी की खुश्बू फिर कमरे में फैल गई। दीवारों की चमक दौगुनी हो गई।

शौहर ने उसे देखा और मुस्कुरा कर सिर्फ़ इतना कहा,,

“अब घर, घर लग रहा है।”

वो हल्का सा शरमाई और बोली,,

“और अब मेरी समझ में आ गया कि शादी के बाद इंसान का असली घर कहाँ होता है।”

उसने आगे बढ़कर धीरे से उसका हाथ थाम लिया।

उस पल दोनों ने बिना कहे एक बात समझ ली,,,

रिश्ते नाराज़गी से नहीं टूटते,, अनकही बातों से टूटते हैं।

और रिश्ते सिर्फ़ प्यार से नहीं चलते, बल्कि एहसास, सब्र और समझदारी से चलते हैं।

मुहब्बत का मतलब हर वक़्त साथ होना नहीं,

बल्कि दूर रहकर भी एक-दूसरे के दिल में जगह बनाए रखना है।

कभी-कभी नई शादी में दोनों को एक-दूसरे की आदत बनने में वक़्त लगता है।

कोई जल्दी समझ जाता है, तो कोई देर से। अगर नीयत साफ़ हो, दिल सच्चा हो, तो हर गलतफ़हमी एक नई समझ में बदल जाती है।

और शायद यही शादी का सबसे ख़ूबसूरत सच भी है,,

शादी के बाद अक्सर दो अजनबी, कैसे धीरे-धीरे एक-दूसरे का सुकून बन जाते हैं। एक ऐसा सुकून जो एक लम्हा भी कम नहीं होना चाहता।

शेर- मशरूफ है तू अपनी ही दुनिया के सिलसिलों में पर

मैं इंतेज़ार तेरा इबादत समझ के करता हूॅं।



लेखक - साजिद अली सतरंगी

फ़ोन -9457530339

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