मेरठ। त्योहारों का असली मकसद किसी की जान लेना नहीं, बल्कि जिंदगी में खुशियां बिखेरना है। इसी भावना को आत्मसात करते हुए मवाना रोड स्थित ट्रांसलेम ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के महानिदेशक डॉ. शमीम अहमद ने पिछले ढाई दशकों से कुर्बानी की परंपरा से दूरी बना रखी है।
एक भावुक पल जिसने बदल दी जिंदगी
इस बड़े बदलाव की कहानी 25 वर्ष पुरानी है। डॉ. शमीम ने बताया कि वे मेवात के एक गांव में बकरीद के लिए बकरा खरीदने गए थे। सौदा तय होते ही विक्रेता का मासूम बच्चा अपने पालतू बकरे से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा। बच्चे का यह दर्द डॉ. शमीम के दिल को छू गया। उन्होंने तुरंत बकरा लौटा दिया और हमेशा के लिए बेजुबानों की कुर्बानी न देने का अटूट संकल्प ले लिया।
'कुर्बानी अपनी बुराइयों की दें, बेजुबानों की नहीं'
डॉ. शमीम का मानना है कि हर जीव को इस धरती पर जीने का पूरा अधिकार है। वे शाकाहार के कट्टर समर्थक हैं और इस बार बकरीद पर उन्होंने सादगी से दाल, रोटी और चावल का सेवन किया। उनका कहना है:
"हमें त्योहारों पर बेगुनाह जीवों की हत्या करने के बजाय अपने भीतर की बुराइयों और गलत आदतों की कुर्बानी देनी चाहिए।"
वे गोहत्या और ऊंटों की कुर्बानी पर भी पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की वकालत करते हैं। जीवों के प्रति उनका प्रेम इस कदर है कि वे बीते चार वर्षों से अपने कॉलेज परिसर में 'एलेक्स' नाम के डॉग का जन्मदिन बेहद धूमधाम से मनाते आ रहे हैं।
वृद्धाश्रम में बांटी खुशियां
इस वर्ष बकरीद के मौके पर डॉ. शमीम गंगानगर मेन डिवाइडर रोड स्थित 'साईं दादा-दादी निवास वृद्धाश्रम' पहुंचे। वहाँ उन्होंने बुजुर्गों से मुलाकात की और उन्हें समोसे व जलेबी का नाश्ता कराया। उन्होंने यह भी संकल्प लिया कि अगले दो दिनों तक वे आश्रम के सभी वृद्धजनों के लिए विशेष भोजन की व्यवस्था करेंगे। डॉ. शमीम अहमद का यह कदम समाज को जीवदया और इंसानियत का एक नया रास्ता दिखा रहा है।

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