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Thursday, April 23, 2026

रॉकलिंक इंडिया ने UP के सिकंदराबाद में लिथियम-आयन बैटरी और रेयर अर्थ मैग्नेट रीसाइक्लिंग यूनिट स्थापित की

नित्य संदेश ब्यूरो

सिकंदराबाद। रॉकलिंक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (Rocklink India Pvt Ltd), जो कि रॉकलिंक एंटरप्राइज की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है, ने उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद में UPSIDC इंडस्ट्रियल एरिया में भारत की अपनी पहली इंटीग्रेटेड रीसाइक्लिंग यूनिट (Integrated Recycling Facility) शुरू करने की घोषणा की है। यह प्लांट लिथियम-आयन बैटरी, रेयर अर्थ मैग्नेट (चुंबकीय धातु) और धातु वाले इंडस्ट्रियल कचरे को पूरी तरह से रीसायकल करने की क्षमता रखता है। इस कदम से भारत को जरूरी खनिज पदार्थों की रिकवरी करने और एक मजबूत 'सर्कुलर सप्लाई चेन' (जहां कचरे से दोबारा कच्चा माल बनाया जा सके) विकसित करने में बड़ी मदद मिलेगी।


इस नई यूनिट की क्षमता की बात करें तो यहां हर साल 10,000 टन लिथियम-आयन बैटरी को रीसायकल किया जा सकेगा। इसके साथ ही, यहां हर महीने 60 टन 'रेयर अर्थ मैग्नेट' (दुर्लभ चुंबकीय धातुओं) को अलग करने और उन्हें प्रोसेस करने का काम भी होगा। अपनी क्षमताओं को और बढ़ाने के लिए कंपनी 2026 की पहली तिमाही तक 'रेयर अर्थ क्लोराइड' प्रोसेसिंग लाइन का काम भी पूरा कर लेगी, जिसकी सालाना उत्पादन क्षमता 1,500 टन होगी। इस उपलब्धि पर बात करते हुए रॉकलिंक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर, लियोनार्ड अलेक्जेंडर अनसोर्ज ने कहा कि इस प्लांट की शुरुआत भारत में जरूरी खनिजों और धातुओं के लिए आधुनिक रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। लिथियम-आयन बैटरी और दुर्लभ धातुओं को प्रोसेस करने की अपनी क्षमता के जरिए कंपनी का मकसद देश में एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना है, जहां कच्चे माल का दोबारा इस्तेमाल हो सके। यह प्रयास भविष्य की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, रिन्यूएबल एनर्जी (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए बेहद जरूरी साबित होगा।

 

रॉकलिंक इंडिया का यह लिथियम-आयन बैटरी रीसाइक्लिंग प्लांट 'ईपीआर' (EPR) के तहत रजिस्टर्ड है और इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह 95 अलग-अलग तरह के बैटरी स्क्रैप को प्रोसेस कर सके। कंपनी ने अपनी खुद की विकसित की हुई 'R2' टेक्नोलॉजी का कमीशनिंग फेज पूरा कर लिया है, जो बैटरी के कचरे को सुरक्षित तरीके से कीमती सामान में बदल देती है। इस टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह प्रोसेसिंग के दौरान बैटरी में मौजूद खतरनाक और जहरीली गैसों (VOCs) को पूरी तरह से हटा देती है, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।

 

यह टेक्नोलॉजी इस प्लांट को अलग-अलग साइज, फॉर्मेट और केमिकल वाली बैटरियों को आसानी से प्रोसेस करने में सक्षम बनाती है। इसका खास 'एनकैप्सूलेटेड' प्रोसेस और गैस ट्रीटमेंट सिस्टम जहरीले पदार्थों को बाहर निकलने से पहले ही सोख लेता हैं, जिससे प्रदूषण का खतरा नहीं रहता। रीसाइक्लिंग के इस प्रोसेस के जरिए एल्युमीनियम, कॉपर और लोहे जैसी धातुओं को 98 प्रतिशत से भी ज्यादा शुद्धता के साथ वापस निकाल लिया जाता है। इसके साथ ही, यहां हाई क्वालिटी वाला 'ब्लैक मास' (Black Mass) भी तैयार होता है, जिसे रिफाइन करके दोबारा नई बैटरी बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।


रीसाइक्लिंग के साथ-साथ कंपनी की प्लानिंग इस प्लांट में पुरानी बैटरियों को ठीक करके दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने (Refurbishment) की भी है। इसके तहत, जो बैटरी सेल्स अभी भी काम कर सकते हैं, उन्हें इंटरनेशनल मानकों के आधार पर टेस्टिंग, बैलेंसिंग और पैक मैन्युफैक्चरिंग के जरिए फिर से तैयार किया जाएगा। इस प्रक्रिया से बैटरियों की लाइफ बढ़ेगी और संसाधनों का सही व ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल सुनिश्चित हो सकेगा, जिससे कचरा भी कम होगा।


इस प्लांट में 'रेयर अर्थ मैग्नेट' को रीसायकल करने के लिए खास व्यवस्था की गई है। यहां नियोडिमियम (NdFeB), समैरियम-कोबाल्ट (SmCo) और अल्निको (AlNiCo) जैसे चुंबक वाले मिश्र धातुओं को प्रोसेस किया जाएगा, जो आमतौर पर इलेक्ट्रिक मोटर्स, जनरेटर और बड़े इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट में इस्तेमाल होते हैं। इसके लिए सेमी-ऑटोमेटेड डिस्मेंटल लाइन्स लगाई गई हैं, जो मैग्नेट वाले हिस्सों को बहुत सफाई से अलग कर देंगी। इससे रीसाइक्लिंग की क्षमता बढ़ेगी और हर बैच की प्योरिटी पर नजर रखना आसान हो जाएगा।


रॉकलिंक इंडिया अपने मैगसाइकल (Magcycle™) 'रिवर्स लॉजिस्टिक्स' मॉडल को भी भारतीय बाजार में लेकर आ रही है, जिसे साल 2018 से यूरोप में चलाया जा रहा है। इस सिस्टम की मदद से पुराने और बेकार हो चुके मैग्नेट स्क्रैप (Magnet scrap) को ऑर्गेनाइज्ड तरीके से इकट्ठा किया जाएगा और फिर उन्हें रीसाइक्लिंग के सही चैनलों तक पहुंचाया जाएगा। इस मॉडल का मकसद मेटल स्क्रैप को दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाकर मार्केट में वापस लाना है, जिससे कच्चे माल की बर्बादी रुके और पर्यावरण को भी फायदा हो।


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