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Saturday, April 18, 2026

विपक्ष की सियासी खोट, नारी शक्ति पर चोट

नित्य संदेश 

​भारतीय लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (128वां संविधान संशोधन) महज एक विधायी दस्तावेज नहीं, बल्कि दशकों से प्रतीक्षित उस संकल्प की सिद्धि का प्रयास था, जिसने महिला आरक्षण के सपनों को हकीकत में बदलने की उम्मीद जगाई थी। लेकिन अप्रैल 2026 के विशेष सत्र में जिस तरह इस अधिनियम को राजनीतिक खींचतान और प्रक्रियात्मक अड़ंगों की बलि चढ़ाया गया, उसने देश की आधी आबादी को पुनः एक गहरे असमंजस और निराशा में धकेल दिया है। यह भारतीय संसदीय इतिहास की एक अत्यंत निराशाजनक घटना के रूप में दर्ज हो गया है कि 1990 के दशक के बाद पहली बार कोई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक सदन में मतदान के दौरान धराशायी हो गया। आज जब भारत विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, तब परिसीमन और जनगणना जैसी अनिवार्य संवैधानिक प्रक्रियाओं को राजनीतिक हथियार बनाना न केवल राष्ट्र के समावेशी विकास में बाधक है, बल्कि यह विपक्ष की एक ऐसी रणनीतिक चूक भी है, जिसकी भरपाई भविष्य में कठिन होगी।

​महिला आरक्षण के पीछे का संघर्ष अत्यंत लंबा और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1996 में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार से शुरू हुआ यह सफर अटल बिहारी वाजपेयी के संकल्पों और 2010 में मनमोहन सिंह सरकार के प्रयासों से होता हुआ वर्तमान तक पहुंचा है। इतिहास गवाह है कि जब-जब यह बिल सदन की चौखट पर आया, तब-तब पुरुष प्रधान राजनीति के वर्चस्व और कोटे के भीतर कोटे जैसी मांगों ने इसकी राह रोकी। सितंबर 2023 में वर्तमान सरकार द्वारा इसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के रूप में पारित करवाना एक ऐतिहासिक क्षण था। हालांकि, इसे पूर्णतः प्रभावी बनाने के लिए परिसीमन की जो अनिवार्य शर्त थी, उसे पूरा करने हेतु लाया गया 131वां संशोधन विधेयक अब सत्ता और विपक्ष के द्वंद्व की भेंट चढ़ चुका है। अप्रैल 2026 का यह सत्र नारी सशक्तिकरण के अध्याय में एक काले दिन की तरह याद किया जाएगा, जहां मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का दूरदर्शी प्रस्ताव केवल इसलिए गिर गया क्योंकि राजनीति को भविष्य के भारत से ऊपर रखा गया।

​सदन में 21 घंटे की सतत चर्चा के बाद जब मतदान हुआ, तो आंकड़े चौंकाने वाले थे। 540 सदस्यीय सदन में 528 सांसदों ने भाग लिया, जिनमें से पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े। संवैधानिक मर्यादाओं के अनुसार, दो-तिहाई बहुमत (352 वोट) से सरकार मात्र 54 वोट दूर रह गई। यह विफलता केवल तकनीकी हार नहीं, बल्कि उन दलों की मंशा पर प्रश्नचिन्ह है जो सार्वजनिक मंचों से तो महिलाओं के नेतृत्व का दंभ भरते हैं, लेकिन निर्णायक मोड़ पर प्रक्रियात्मक बहाने बनाकर पीछे हट जाते हैं। विपक्ष का तर्क था कि आरक्षण बिना परिसीमन के तत्काल लागू हो, परंतु संवैधानिक दृष्टि से यह असंभव था। भारत की बदलती जनसंख्या के बीच बिना सीटों के वैज्ञानिक पुनर्निर्धारण के महिला आरक्षित क्षेत्रों को तय करना न केवल प्रशासनिक चुनौती होती, बल्कि भविष्य में अंतहीन कानूनी कठिनाइयों को भी जन्म देता।

​परिसीमन एक पारदर्शी प्रक्रिया है जो यह सुनिश्चित करती है कि देश का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के वास्तविक अनुपात में हो। सरकार का यह तर्क तर्कसंगत था कि सीटों की संख्या बढ़ाने से किसी भी राज्य का राजनीतिक कद कम नहीं होगा और महिलाओं को नए पैमानों के अनुसार अधिक अवसर मिलेंगे। इस विकासोन्मुख सोच को उत्तर बनाम दक्षिण का मुद्दा बनाकर रोकना वास्तव में देश की प्रगति के पहिए को पीछे खींचने जैसा है। भले ही विपक्ष ने इस विधेयक को गिराकर क्षणिक राजनीतिक विजय का अनुभव किया हो, लेकिन रणनीतिक रूप से यह उनकी एक आत्मघाती भूल साबित हो सकती है। इससे उन पर जो नारी-विरोधी होने का ठप्पा लगा है, वह आगामी चुनावों में धुंधला नहीं होगा। राजनीति में नीयत और समय का महत्व होता है। जब देश की महिलाएं अधिकारों की दहलीज पर खड़ी थीं, तब किंतु-परंतु की राजनीति ने विपक्ष की नकारात्मक छवि को ही पुख्ता किया है।

​यह तथाकथित संसदीय जीत वास्तव में विपक्ष की एक बड़ी वैचारिक हार है। आज का जागरूक समाज देख रहा है कि किस तरह पारिवारिक राजनीति करने वाले दल अपने घर की महिलाओं को तो शीर्ष पर बैठा रहे हैं, लेकिन सामान्य परिवेश से आने वाली योग्य नारियों को उनके हक से वंचित कर रहे हैं। यह दोहरा मानदंड स्पष्ट संदेश दे रहा है कि कुछ दलों की नीयत सशक्तिकरण की नहीं, बल्कि केवल राजनीतिक श्रेय बटोरने की है। आरक्षण के इस संघर्ष के साथ-साथ हमें उस पुरुष प्रधान मानसिकता पर भी प्रहार करना होगा, जहाँ महिला जनप्रतिनिधि केवल एक मुखौटा होती हैं और सत्ता की बागडोर पुरुष परिजन संभालते हैं। नारी अब केवल आरक्षण की याचक नहीं, वह नेतृत्व की प्रबल दावेदार है। जब तक राजनीतिक दल महिलाओं को रबर स्टैम्प के रूप में इस्तेमाल करना बंद नहीं करेंगे, तब तक आरक्षण का वास्तविक पुण्य धरातल पर नहीं दिखेगा।

​आज की भारतीय नारी सजग, शिक्षित और आत्मनिर्भर है। वह शासन की नीतियों और उनके क्रियान्वयन को सीधे महसूस कर रही है। महिला वोटर अब किसी भी दल की हार-जीत तय करने वाली केवल मूक संख्या नहीं, बल्कि एक निर्णायक शक्ति बन चुकी है। अधिनियम को लटकाने का खमियाजा राजनीतिक दलों को आगामी जनादेश में निश्चित रूप से भुगतना पड़ सकता है। आज विपक्ष पर विश्वास का संकट खड़ा है; उनके महिला सशक्तिकरण के दावे अब बेमानी और चुनावी जुमले जैसे लग रहे हैं। परिसीमन के विरोध को विकास और प्रतिनिधित्व में बाधा के रूप में देखा जा रहा है।

​अंततः, नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक कानून नहीं, बल्कि एक विकसित भारत के निर्माण का संकल्प है। एक सशक्त नारी ही राष्ट्र की असली ऊर्जा होती है। यदि हम महिलाओं के अधिकारों को केवल संकीर्ण राजनीतिक चश्मे से देखते रहे, तो यह इतिहास की एक और धूल खाती फाइल बनकर रह जाएगा। 131वें विधेयक का गिरना लोकतंत्र के लिए आत्ममंथन का क्षण है। यदि इस गतिरोध को दूर करने के लिए तत्काल और ईमानदार प्रयास नहीं किए गए, तो जनता आगामी चुनावों में उन्हें पुनः सोचने पर विवश कर देगी। भारत की लोकतांत्रिक यात्रा तभी पूर्णता प्राप्त करेगी, जब देश की आधी आबादी वास्तव में राष्ट्र की मुख्य शक्ति बनकर नेतृत्व करेगी।

- सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'

​ संपादिका, मध्य प्रदेश, नित्य संदेश


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