कभी हम बचपन में खेल खेला करते थे, इन खेलों में परिवारों के संस्कार भी झलकते थे। किसी परिवार में अगर बच्चा मार खाकर अपने दोस्तों से आ जाता था, तो माता-पिता कहते थे—"तू मार खाकर क्यों आया, जा तू भी उसे मार कर आ।"
यह बच्चों का झगड़ा कभी-कभी विकराल रूप लेकर बड़े-बड़ों को आपस में लड़वा देता था, और झगड़ा थाने या कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाता था। तो क्या आज इस तरह का झगड़ा समाप्त हो गया है? नहीं, अब यह झगड़ा घरों और पड़ोस से निकलकर समाज, राष्ट्र एवं अंतरराष्ट्रीय झगड़ों तक पहुंच गया है। बात-बात में गाली-गलौज, चाकूबाजी—यह तो आम बात होती जा रही है। कहीं सास बहू को प्रताड़ित करती है, तो कहीं बहू सास की हत्या कर रही है; यह हमारा समाज कहां जा रहा है?
देखा जाए तो आज भी हमारे भारत के गांवों में संस्कार व मर्यादा जीवित है, वहां बड़ों का सम्मान किया जाता है। किंतु शहरों में आए दिन आपस में झगड़े होते रहते हैं; हमारे अखबार इन घटनाओं से भरे पड़े रहते हैं।
"क्या तुमने हमें मारा, हम तुम्हें मारेंगे; और तुमने 20 को मारा है, हम तुम्हारे 50 को मारेंगे" और मार कर खुशियां मनाते हैं। लगता है इन्होंने बहुत बड़ा काम किया है, वाह-वाही होनी चाहिए। आज हमारे देश में ही क्या, विदेशों में भी तो यही हो रहा है।
सिर्फ बदला ही तो? इस तरह का बदला ठीक नहीं है। अरे, आपने युद्ध शुरू कर दिया, बेचारे सैनिक बलिदान के बकरे बन गए। थोड़े दिन मारामारी करी और युद्ध विराम की घोषणा कर दी। किंतु युद्ध विराम करने वालों ने सोचा है क्या, कि जो सैनिक या जनता मारे गए हैं या अपाहिज हुए हैं, उनके ऊपर क्या गुजर रही है? साथ ही उनके परिवार वाले जीवन भर कितना दुख सहते हैं। पैसा ही इंसान की कमी पूरी नहीं करता है; बच्चे पिता के लिए, मां-बाप औलाद के लिए और महिला अपने सुहाग के लिए तरसती है। जन-धन की हानि से देश और समाज पिछड़ जाता है।
पड़ोसी बार-बार आतंकवादियों का नाम लेकर हर बार गुनाह करता है। हमारे उन्नति के शिखर पर पहुंचते देश को देखकर बार-बार घात लगाता है। क्या एक बार उसे ऐसा डर नहीं दिया जा सकता जिससे वह बार-बार नीच हरकतें न करे?
हम गौतम और गांधी की संतान हैं, अहिंसा हमारा परम धर्म है। हम चींटी को भी दाना देते हैं, उसे मारना भी पाप है; फिर ये क्यों नहीं सोचते कि उन माता-पिता का कलेजा देखिए जो अपने बच्चों को सेवा में भर्ती करते हैं। क्या उन्हें अपने बुढ़ापे का सहारा नहीं चाहिए? क्या बच्चों को पिता का प्यार व सुहागन को अपना सुहाग प्यारा नहीं है?
अगर बार-बार युद्ध की स्थिति बने, तो क्या एक बार में ही आर-पार की लड़ाई हो जानी चाहिए? यह हमेशा का "तुमने मुझे मारा, मैं तुम्हें मारूंगा" समाप्त होना चाहिए। आज हमारे देश की बागडोर सशक्त हाथों में है, और उस अर्जुन के साथ पूरा भारत है।
अब अगर दुश्मन फन फैलाए, तो उसे कुचलना ही होगा; तभी हम भारतीय सही मायने में अहिंसावादी व न्यायप्रिय भारत की संतान कहलाने के योग्य होंगे।
"तुमने मुझे मारा, मैं भी तुझे मारूंगा" से अब काम नहीं चलेगा।
— पुष्पा दसोंधी 'सौमित्र'
इंदौर, मध्यप्रदेश


No comments:
Post a Comment