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Friday, April 17, 2026

भारत के पूर्ण ऊर्जा स्वराज का शंखनाद है कल्पक्कम पीएफबीआर



नित्य संदेश 
​भारतीय विज्ञान के क्षितिज पर एक नया सूर्योदय हुआ है। तमिलनाडु के कल्पक्कम की धरती ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता और संकल्प की एक ऐसी इबारत लिखी है, जिसने भारत को विश्व के अग्रणी राष्ट्रों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया है।
​तमिलनाडु के तटीय शहर कल्पक्कम में स्थित 500 मेगावाट इलेक्ट्रिक प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने जब पहली बार स्व-स्थायी परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया हासिल की, तो इसकी गूंज बीजिंग से लेकर वाशिंगटन तक के गलियारों में सुनाई दी। यह केवल एक तकनीकी परीक्षण की सफलता नहीं थी, बल्कि वैश्विक परमाणु अखाड़े में भारत द्वारा चला गया वह महाशक्तिशाली दांव था, जिसने दुनिया की स्थापित शक्तियों के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत के लिए एक परिभाषित करने वाला क्षण और राष्ट्र के लिए गर्व का पल बताया है। यह उपलब्धि महज एक नए रिएक्टर की शुरुआत भर नहीं है, बल्कि उस थोरियम खजाने का ताला खोलने वाली वह सर्वकुंजी है, जिसे अब तक दुनिया की मुट्ठी भर महाशक्तियां ही अपनी जागीर समझती थीं। भारतीय वैज्ञानिकों की इस प्रतिभा और इंजीनियरिंग कौशल ने न केवल तकनीकी सीमाओं को लांघा है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की आत्मनिर्भरता का शंखनाद भी कर दिया है।
​यह गौरवशाली उपलब्धि वास्तव में महान परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा द्वारा 1950 के दशक में रचित भारत के अनूठे तीन-चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण मंजिल है। डॉक्टर भाभा ने दूरदर्शिता के साथ भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जो खाका खींचा था, उसका पहला चरण प्राकृतिक यूरेनियम से चलने वाले भारी जल रिएक्टरों (पीएचडब्ल्यूआर) का था, जो बिजली उत्पादन के साथ-साथ प्लूटोनियम तैयार करते हैं। अब सफल हुआ यह दूसरा चरण यानी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (एफबीआर), इसी प्लूटोनियम को ईंधन के रूप में उपयोग करता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपनी खपत से अधिक विखंडनीय सामग्री पैदा करता है, जिसे तकनीकी भाषा में ब्रीडिंग कहा जाता है। यह प्रक्रिया आगे चलकर तीसरे चरण का मार्ग प्रशस्त करेगी, जिसमें भारत के विशाल थोरियम-232 भंडार को यूरेनियम-233 में बदलकर एक स्व-स्थायी ऊर्जा चक्र स्थापित किया जाएगा। कल्पक्कम का यह स्वदेशी प्रोटोटाइप इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (आईजीसीएआर) द्वारा अभिकल्पित किया गया और भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी) द्वारा निर्मित किया गया है, जो मेक इन इंडिया का सबसे सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है।
वैश्विक परिदृश्य में देखें तो यहां नकल बनाम असली नवाचार का मुकाबला स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। चीन ने पिछले दशक में रिकॉर्ड गति से 58 से अधिक परमाणु रिएक्टर खड़े किए हैं, लेकिन उसकी पूरी परमाणु क्षमता मुख्य रूप से विदेशी यूरेनियम आयात और रूसी या पश्चिमी डिजाइनों पर आधारित है। चीन आज भी तकनीकी रूप से आयात पर निर्भर है, जबकि अमेरिका, जापान, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे विकसित राष्ट्र अरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद फास्ट ब्रीडर तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर सफल बनाने में विफल रहे हैं। फ्रांस का सुपरफीनिक्स और जापान का मोंजू रिएक्टर तकनीकी जटिलताओं के कारण बंद करने पड़े। वर्तमान में रूस के पास सक्रिय फास्ट ब्रीडर रिएक्टर हैं, लेकिन अब भारत दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन गया है जिसके पास व्यावसायिक स्तर का स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है। भारत ने किसी देश की नकल करने के बजाय अपनी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप स्वदेशी तकनीक विकसित की है, जो आज दुनिया के लिए एक बड़ा अजूबा और भरपूर ईर्ष्या का विषय है।
यठभारत की इस असाधारण मजबूती का असली राज उसके विशाल थोरियम भंडार में छिपा है। हमारे देश के समुद्री तटों की मोनाजाइट रेत में दुनिया का सबसे बड़ा थोरियम खजाना मौजूद है, जो करीब 2.25 लाख टन से अधिक उपयोग योग्य थोरियम के रूप में है। जहां पूरी दुनिया यूरेनियम के सीमित और समाप्त होते भंडारों को लेकर भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के प्रति सशंकित है, वहीं भारत इस थोरियम तकनीक के माध्यम से अगले 300 से 400 वर्षों तक असीमित, स्वच्छ और सस्ती बिजली का उत्पादन करने में सक्षम होगा। पीएफबीआर में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड ईंधन के साथ थोरियम आवरण का जो प्रयोग किया गया है, वह यूरेनियम-233 तैयार करेगा। जब इस कार्यक्रम का तीसरा चरण पूर्ण रूप से सक्रिय होगा, तब भारत वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की शर्तें खुद तय करने की स्थिति में होगा और विश्व का सबसे बड़ा ऊर्जा केंद्र बन जाएगा। यह तकनीक न केवल ईंधन खपत से अधिक उत्पादन की गारंटी देती है, बल्कि परमाणु अपशिष्ट को भी न्यूनतम रखकर पर्यावरण संरक्षण का मार्ग प्रशस्त करती है।
​यह ऐतिहासिक उपलब्धि भविष्य की आने वाली पीढ़ियों के लिए ऊर्जा संकट के अंधेरे का सदैव का अंत है। वर्तमान में भारत की परमाणु क्षमता लगभग 8 गीगावाट के करीब है, जिसे विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के तहत 100 गीगावाट तक बढ़ाने का संकल्प लिया गया है। कल्पक्कम का यह मील का पत्थर इस यात्रा को नई और तीव्र गति प्रदान करेगा। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) की अत्यंत कड़ी सुरक्षा समीक्षाओं के बाद हासिल हुई यह सफलता भारत को वैश्विक स्तर पर पश्चिमी देशों से काफी आगे लाकर खड़ा करती है। अमेरिका और यूरोप के पास पुराने रिएक्टरों का जाल तो है, लेकिन वे न तो इतने किफायती हैं और न ही इतनी अधिक ईंधन उत्पादन में सक्षम हैं। भारत अब रूस के बाद दुनिया की ऐसी एकमात्र शक्ति बन चुका है जिसके पास खपत से ज्यादा ईंधन पैदा करने वाला रिएक्टर है। चीन की रफ्तार भले ही तेज हो, लेकिन उसकी विदेशी निर्भरता उसकी कमजोरी है, जबकि भारत अपनी स्वदेशी तकनीक और थोरियम संसाधनों के बल पर ऊर्जा का सम्राट बनने की दिशा में अटल है।
​अंततः कल्पक्कम की यह विजय भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और वर्तमान नेतृत्व की दूरदर्शिता का सामूहिक परिणाम है। डॉक्टर भाभा का वह महान सपना आज कल्पक्कम के तटों पर साकार हुआ है। यह रिएक्टर महज एक मशीन या बिजली घर नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की ऊर्जा स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और भारत के उभरते वैश्विक नेतृत्व का जीवंत प्रतीक है। थोरियम का यह मौन हथियार अब पूरी तरह जाग चुका है और भारत को पूर्ण ऊर्जा स्वराज की ओर ले जा रहा है। यह संकल्प आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा कि अटूट इच्छाशक्ति और स्वदेशी नवाचार के बल पर किसी भी असंभव लक्ष्य को भारत प्राप्त कर सकता है। भारत अब परमाणु ऊर्जा के वैश्विक मंच पर पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ा है और यह सफलता विश्व को संदेश दे रही है कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था अब हिंदुस्तान की शर्तों पर ही तय होगी।

- ​सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'
स्वरचित, मौलिक आलेख

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