नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। सीसीएस यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में को “मोहक्किकीन व नाकिदीन-ए-ग़ालिब” विषय पर एक ऑनलाइन प्रोग्राम का आयोजन किया गया। इस प्रोग्राम में उर्दू अदब के मशहूर अहल-ए-इल्म ने शिरकत की और मिर्ज़ा ग़ालिब की शख्सियत और फ़न पर अपने ख़यालात पेश किए। प्रोग्राम की सदारत डॉ. तक़ी आबदी (कनाडा) ने की, जबकि सरपरस्ती प्रो. असलम जमशेदपुरी ने फ़रमाई। ख़ुसूसी मुक़र्रिर के तौर पर प्रो. सगीर अफ़राहीम मौजूद रहे।
अपने खिताब में डॉ. तक़ी आबदी ने कहा कि अगर हम ग़ालिब को समझ लें, तो मीर और हाली को समझना भी आसान हो जाता है। उन्होंने ग़ालिब को उर्दू अदब का पहला तरक़्क़ी-पसंद शायर बताया और कहा कि अभी तक उनकी तरक़्क़ी-पसंदी पर कोई मुकम्मल किताब सामने नहीं आई है। साथ ही यह भी कहा कि ग़ालिब के बहुत से अशआर और उनके काफ़ी गोशे अभी तहक़ीक़ के मुंतज़िर हैं।
प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि ग़ालिब के ख़ुतूत (पत्र) का अदब में बहुत ऊँचा मक़ाम है और इस पर और काम होने की ज़रूरत है। प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि ग़ालिब पर तहक़ीक़ और तनक़ीद दोनों हुई हैं, लेकिन अभी भी कई पहलू ऐसे हैं जिन पर ग़ौर किया जाना चाहिए।
इस मौके पर मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत पर मक़ाले भी पेश किए गए, जिनमें ग़ालिब शनासी के नए रुझान और अहम मुहक़्क़िक़ीन के कामों पर रोशनी डाली गई।इस मौके पर तीन पेपर भी पढ़े गए। फरहत अख्तर, मेरठ ने “मौलाना इम्तियाज अली अर्शी एक रिसर्चर के तौर पर गालिब” शीर्षक के तहत अपने बेहतरीन पेपर पेश किए, इरफान आरिफ, गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, रियासी, जम्मू ने “21वीं सदी में गालिब का ज्ञान” शीर्षक के तहत अपने बेहतरीन पेपर पेश किए ग़ालिब”। प्रोग्राम में डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, सैयदा मरियम इलाही, फरहत अख्तर, सईद अहमद सहारनपुरी, फैजान जफर, मुहम्मद शमशाद, तलबा और दीगर अहल-ए-अदब की काफ़ी तादाद ऑनलाइन शामिल रही। यह प्रोग्राम ग़ालिब की शायरी और उनकी फिक्र को समझने की एक अहम कोशिश साबित हुआ।

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