- 30 साल पहले बना था 100 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट
- देश के नामी आर्किटेक्ट ने खींचा था ईदगाह के विकास का खाका
सलीम सिद्दीकी
नित्य संदेश, मेरठ। यदि 30 साल पहले बुना गया मेरठ की शाही ईदगाह के विकास का खाका धरातल पर उतर जाता तो ईदगाह में नमाज अदा करने वाले हर ख्वाहिशमंद की ख्वाहिश तो पूरी होती ही, साथ ही साथ मेरठ प्रशासन की टेंशन भी खत्म हो जाती। देश के टॉप फाइव में शुमार मुंबई के मशहूर आर्किटेक्ट अहमद कासू ने ईदगाह की नई प्रस्तावित बिल्डिंग को डिजाइन किया था।
आर्किटेक्ट अहमद कासू की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन तक में अहमद कासू द्वारा डिजाइन किए गए विभिन्न प्रोजेक्ट्स को तरजीह दी गई थी। शाही ईदगाह के सचिव सैयद सलमान सब्ज़वारी एवं संयुक्त सचिव सैयद अनस सब्ज़वारी के अनुसार अहमद कासू उस समय ईदगाह के मुतवल्ली रहे सैयद आसिम अली सब्ज़वारी के न्योते पर ईदगाह का डिजाइन तैयार करने खुद मेरठ आए थे। उस समय इस प्रोजेक्ट पर लगभग 100 करोड़ रुपए खर्च आना था, लेकिन बजट की कमी के चलते प्रोजेक्ट गति नहीं पकड़ पाया। सैयद अनस सब्ज़वारी के अनुसार यदि इस प्रोजेक्ट पर आज के समय में काम हो तो लगभग 400 से 500 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
यह होने थे कार्य - मल्टीपरपस के लिए 18-18 मंजिल की 2 मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स बनी थी।
- ईदगाह के किरायेदारों को भी स्टैंडर्ड मकान देकर उन्हें इन्हीं में शिफ्ट किया जाना था।
- लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग कॉलेज बनने थे।
- एक बड़ा मैरिज हॉल भी प्रस्तावित था।
- ट्रेड सेंटर के हब बनने थे।
- और भी कई अन्य योजनाऐं प्रस्तावित थी
योजना पर काम अब संभव शाही ईदगाह के विकास के लिए जो प्रोजेक्ट 30 साल पहले बना था उस पर अब काम लगभग नामुमकिन है। सबसे बड़ा कारण घनाभाव है। हालांकि इसके लिए यदि कुछ बड़े धनाढ्य मुस्लिम घराने हदिया के रूप में मदद भी करें तो भी इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में अब तकनीकी दिक्कतें भी हैं। दरअसल ईदगाह परिसर के अंदर जहां यह सब काम होना था वहां इसके लिए नीचे (अंडरग्राउंड) खुदाई भी होनी थी, लेकिन अब इस जगह रैपिड और मेट्रो की सुरंगे बिछ चुकी हैं लिहाजा खुदाई संभव ही नहीं है।
सैयद आसिम अली ने अपना जीवन ही लगा दिया एक लंबे समय तक शाही ईदगाह के मुतवल्ली रहे सैयद आसिम अली सब्ज़वारी ने ईदगाह के विकास के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। सैयद आसिम अली ने ईदगाह की कमान उस समय संभाली थी, जब यह ईदगाह गड्ढों में हुआ करती थी। इसके अलावा यहां असामाजिक तत्वों का अड्डा था, और भी कई विसंगतियां ईदगाह परिसर के साथ जुड़ी हुई थीं। इन सब के बावजूद आसिम अली सब्ज़वारी ने अपनी मेहनत के दम पर इस ईदगाह को उसका 'शाही वजूद' बक्शा।

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