नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। पहले दिन कथाव्यास प्रो. सुधाकराचार्य के आवास पर मयूरविहार में सामवेद की चतुर्थ कथा में इन्द्र की कथा आगे बढी। त्रिपाठी जी ने बताया कि इन्द्र एक सच्ची सत्ता हैं। समय समय पर विभिन्न सत्ताओं द्वारा विभिन्न मान्यताओं का प्रचार प्रसार हुआ। ईश्वर के अनेक रुपों का विस्तार हुआ। परन्तु ईश्वर की कृपा स्वरुप वेद और उनका स्वरुप बचा रह गया।
बारह बालखिल्यों का वर्णन किया गया। बारह आदित्य एक एक राशि पर चलने वाले सूर्य के रूप हैं। ब्रह्मा नें एक एक राशि का एक एक आदित्य को अधिपति बनाया। सत्ताईस नक्षत्रों का वर्णन हुआ। सवा दो नक्षत्रों की एक राशि बनी। इसीलिये बारह राशियां हुईं। बारह आदित्य अदिति के बेटे हैं। ये अपने घूर्णन और अतन के जरिये अपनी जगह पर स्थित हैं। इन्द्र लोगों की नाव हैं। तारने वाले हैं। इन्द्र पांचो इन्द्रियों के स्वामी की सुरक्षा करते हैं। मरुत कहते हैं हे मरणधर्मा प्राणी! ठीक प्रकार से अपना जीवन बिताओ। अपनी रक्षा करो व इनको हवि देकर इनका स्वागत करो। मनुष्य देवताओं से अपना कार्य करवाने के लिए प्रार्थना करता है परन्तु इन्द्र कहते हैं कि अच्छा जीवन बिताओ तो सबकुछ अच्छा होगा व सुख सम्पत्ति व ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी।

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