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Friday, March 13, 2026

शैवाल अनुसंधान प्रशिक्षण में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट व स्पाइरुलिना पर हुआ प्रशिक्षण



नित्य संदेश ब्यूरो 
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के वनस्पति विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के पाँचवें दिन प्रतिभागियों को शैवाल अनुसंधान, जैव उत्पादों के निष्कर्षण तथा इसके औद्योगिक उपयोगों से संबंधित उन्नत तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया।

यह छह दिवसीय अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम 9 से 14 मार्च तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें भारत के विभिन्न प्रदेशों के वैज्ञानिक, शोधार्थी और विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का आयोजन वनस्पति विज्ञान विभाग द्वारा यूजीसी–एमएमटीटीसी, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के सहयोग से किया जा रहा है।

कार्यक्रम के पाँचवें दिन की शुरुआत तकनीकी सत्र–1 से हुई। प्रथम सत्र में एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी, एमिटी यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम से आए इंजीनियर कुंतल शर्मा ने प्रतिभागियों को प्रोटीन के निष्कर्षण और उसकी मात्रा निर्धारण की प्रयोगात्मक प्रक्रिया का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने बताया कि शैवाल में प्रोटीन की मात्रा अत्यधिक होती है और इसका उपयोग पोषण, औषधि तथा जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में व्यापक रूप से किया जा सकता है। उन्होंने प्रयोगशाला में अपनाई जाने वाली विभिन्न तकनीकों और उपकरणों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।

इसके बाद वनस्पति विज्ञान विभाग, सीसीएसयू के डॉ. रमाकांत ने प्रतिभागियों को कार्बोहाइड्रेट के निष्कर्षण और उसके मात्रात्मक विश्लेषण की विधि समझाई। उन्होंने बताया कि शैवाल में पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट जैव-ऊर्जा, खाद्य उद्योग और औषधीय उत्पादों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को प्रयोगात्मक तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान भी प्रदान किया गया।

अगले सत्र में इंजीनियर कुंतल शर्मा ने ही फाइकोबिलिन्स के निष्कर्षण और मात्रा निर्धारण पर प्रशिक्षण दिया। उन्होंने बताया कि फाइकोबिलिन्स एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक पिगमेंट है, जिसका उपयोग खाद्य रंग, औषधि और जैव-प्रौद्योगिकी उद्योग में किया जाता है। उन्होंने इस प्रक्रिया में प्रयोग होने वाली विधियों और सावधानियों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।

इसी क्रम में पतंजलि ग्रामोद्योग, हरिद्वार से आए डॉ. आर. एस. पांडेय ने “स्पाइरुलिना द्वारा दुग्ध उत्पादों में मूल्य संवर्धन” विषय पर प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया। उन्होंने बताया कि स्पाइरुलिना एक अत्यंत पोषक तत्वों से भरपूर सूक्ष्म शैवाल है, जिसका उपयोग दूध तथा अन्य खाद्य उत्पादों में मिलाकर उनके पोषण मूल्य को बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने इसके व्यावसायिक उपयोग और संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला।

इसके बाद वनस्पति विज्ञान विभाग, सीसीएसयू के डॉ. सुशील कुमार ने शैवाल में पाए जाने वाले हैलोजेनेटेड द्वितीयक मेटाबोलाइट्स और उनके औषधीय उपयोग विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि शैवाल में कई प्रकार के जैव-सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं, जिनका उपयोग नई दवाओं के विकास में किया जा सकता है। इस क्षेत्र में अनुसंधान के व्यापक अवसर मौजूद हैं।

इसके पश्चात महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, सतना के पूर्व कुलपति प्रोफेसर एन. सी. गौतम ने “अलगल एंटरप्रेन्योरशिप” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि शैवाल आधारित उद्योग भविष्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने युवाओं को इस क्षेत्र में स्टार्ट-अप और उद्यमिता के लिए प्रेरित किया तथा बताया कि शैवाल से जैव-ईंधन, खाद्य उत्पाद, औषधियाँ और कॉस्मेटिक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।

तकनीकी सत्र–2 की अध्यक्षता जितेंद्र कुमार तथा डॉ. सुशील कुमार ने की। इस सत्र में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब, बठिंडा के प्रोफेसर फेलिक्स बास्ट ने “ब्लू फ्रंटियर” विषय पर विस्तृत प्रशिक्षण दिया। उन्होंने शैवाल की खेती, उसके व्यावसायिक उत्पादन और उससे जुड़े स्टार्ट-अप के अवसरों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि शैवाल आधारित उद्योग पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी हो सकते हैं।

दोपहर के भोजनावकाश के बाद आयोजित तकनीकी सत्र–3 की अध्यक्षता प्रोफेसर विजय मलिक तथा सह-अध्यक्षता डॉ. रमाकांत ने की। इस सत्र में वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. सचिन कुमार ने शैवाल प्रजातियों में संभावित जीन की कम्प्यूटेशनल भविष्यवाणी विषय पर प्रशिक्षण दिया। उन्होंने बताया कि आधुनिक जैव-सूचना विज्ञान तकनीकों की सहायता से शैवाल में मौजूद महत्वपूर्ण जीनों की पहचान की जा सकती है, जिससे जैव-प्रौद्योगिकी और औषधि विकास के क्षेत्र में नए अवसर खुलते हैं।

इसके बाद डॉ. आर. एस. पांडेय ने पुनः प्रतिभागियों को स्पाइरुलिना द्वारा दुग्ध उत्पादों में मूल्य संवर्धन की तकनीकों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि किस प्रकार स्पाइरुलिना को विभिन्न खाद्य उत्पादों में शामिल कर उनके पोषण स्तर को बढ़ाया जा सकता है।

अंतिम तकनीकी सत्र–4 की अध्यक्षता डॉ. अशोक कुमार तथा सह-अध्यक्षता डॉ. ईश्वर सिंह ने की। इस सत्र में डॉ. आर. एस. पांडेय ने स्पाइरुलिना आधारित उत्पादों के निर्माण और उनके व्यावसायिक उपयोग पर प्रशिक्षण दिया। उन्होंने बताया कि स्पाइरुलिना से स्वास्थ्य पूरक आहार, न्यूट्रास्यूटिकल उत्पाद और अन्य कई उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिनकी वैश्विक बाजार में अत्यधिक मांग है।

प्रोफेसर फेलिक्स बास्ट ने प्रतिभागियों के साथ सीसीएस विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के एल्गल कल्चर कलेक्शन का भ्रमण भी किया और यह देखकर आश्चर्य व्यक्त किया कि विश्वविद्यालय में विभिन्न प्रकार की शैवाल प्रजातियों का एक समृद्ध एल्गल कल्चर कलेक्शन उपलब्ध है।

कार्यक्रम के दौरान डॉ. राजेश पांडेय ने डॉ. रमाकांत एवं उनके सहयोगियों के साथ मिलकर दूध आधारित पाँच स्पाइरुलिना उत्पाद—दूध, दही, चटनी और शिकंजी आदि तैयार कर उनका प्रदर्शन किया। सभी प्रतिभागियों ने इन उत्पादों का स्वाद चखा और उनकी सराहना की।

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