प्रोफेसर ( डॉ )अनिल नौसरान
नित्य संदेश, मेरठ। हाल ही में केंद्र सरकार ने NEET PG 2025 से संबंधित एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया में यह दलील दी कि परीक्षा देने वाला अभ्यर्थी पहले से ही एक योग्य डॉक्टर है और कट-ऑफ घटाने से डॉक्टरों की काबिलियत पर कोई असर नहीं पड़ता।
यह तर्क कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है
यदि MBBS डॉक्टर पहले से ही पूरी तरह सक्षम हैं, तो फिर NEET PG जैसी कठिन और समय लेने वाली परीक्षा की आवश्यकता ही क्या है?
क्यों हर साल लाखों युवा डॉक्टरों को मानसिक तनाव, आर्थिक बोझ और अनिश्चित भविष्य के बीच झोंका जाता है?
NEET पीजी का मूल उद्देश्य था—
योग्यता की निष्पक्ष जाँच!
उच्च स्तरीय विशेषज्ञ डॉक्टरों का चयन!
मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना!
यदि कट-ऑफ घटाने या योग्यता को “औपचारिक” मान लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता, तो यह पूरी चयन प्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि किसी को भी मेडिकल शिक्षा के भविष्य की चिंता नहीं दिखती।
नीतियाँ तात्कालिक सुविधा के लिए बदली जा रही हैं, न कि दीर्घकालिक गुणवत्ता के लिए।
आज हम अगर यह मान लें कि सब पहले से ही योग्य हैं, तो कल विशेषज्ञता, प्रशिक्षण और उत्कृष्टता का क्या मूल्य रह जाएगा?
यह स्थिति न केवल डॉक्टरों के भविष्य बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी चिंताजनक है।
यह शर्मनाक है कि निर्णय लेने वालों को यह समझ ही नहीं आ रहा कि वे किस दिशा में मेडिकल शिक्षा को ले जा रहे हैं।
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