नित्य संदेश ब्यूरो
इंदौर। ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है?
इन प्रेरणास्पद पंक्तियों को भिण्ड जिले में मेहगांव कस्बे के प्रसिद्ध दिव्यांग तैराक पद्मश्री सतेन्द्र सिंह लोहिया ने एक बार फिर अपने हौंसले और जज्बे से साकार कर दिया है। जब पानी बर्फीला हो, तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जा रहा हो, शरीर की अपनी सीमाएं बार बार जवाब दे रही हों तब भी सतेन्द्र लोहिया समंदर के सरताज बनने के लिए सब कुछ भूल जाते हैं।
उनकी शारीरिक सीमाएं हवा, पानी, बारिश के बीच समंदर पर तिरंगा लहराने को जूझती रहती है और आखिर में फिर एक बार भिण्ड की बेसली नदी में गोता लगाने वाले सतेन्द्र लोहिया एशिया के बर्फीले पानी वाले समंदर को जीत आए हैं। उन्होंने 9 घंटे 22 मिनिट में न्यूजीलैंड की 24 किलोमीटर लंबी कठिनतम समुद्री तैराकी कुक स्ट्रेट पर अपने अदम्य साहस, संकल्प और जीजिविषा को दर्ज कर दिया है और वे ऐसा रिकार्ड बनाने वाले अब एशिया के पहले दिव्यांग तैराक बन चुके हैं। 12 फरवरी 2026 के ऐतिहासिक दिन भारत के इस दिव्यांग तैराक ने मानवीय क्षमताओं की सीमाओं को आसमान सा उंचा खड़ा करके खुद को इतिहास में दर्ज कर दिया है। भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित हो चुके दिव्यांग तैयार सतेन्द्र लोहिया ग्वालियर चंबल से निकलकर भारत और विश्व में दिव्यांगों के हौंसले और जुनून से आत्मविश्वास की नई परिभाषाएं देश दुनिया में स्थापित कर रहे हैं।
कैटलीन की लहरों से भी जीता था संकल्प
पैरों की कमी के बाबजूद बेसली नदी में तैरने वाले सतेन्द्र सिंह लोहिया इससे पहले कैटलीना चैनल विजेता बन चुके थे। उन्होंने 18 अगस्त 2019 को अमरीका में बर्फीले पानी वाले कैटलीना चैनल को रिकार्ड 11.34 घंटे में पार करके रिले तैराकी में इतिहास रच दिया था। वे तब भी 70 फीसदी निशक्त होकर भी पैरालंपिक तैराकी में यह रिकार्ड कायम करने वाले एशिया के पहले पैरा तैराक बने थे। मध्यप्रदेश के पैरास्वीमर सतेन्द्र इससे पहले 2018 में इंग्लिश चैनल पार करके भी रिकार्ड बना चुके हैं।
चंबल के गांवों के जज्बे के प्रतीक हैं सतेन्द्र लोहिया
प्रतिभाएं साधनों की मोहताज नहीं होतीं। चंबल के गाता गांव में पैदा हुए सतेन्द्र सिंह लोहिया की मेहनत लगन, उत्साह और आत्मविश्वास हमें यही सीख देता है। वे एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे। बचपन में गलत इलाज के कारण उनके दोनों पैरों ने 70 फीसदी काम करना बंद कर दिया मगर उनके मां बाप ने उन्हें कहीं कमतर नहीं समझा। हमेशा लड़ने और जूझने का हौंसला दिया। अपने मां पिता की इसी सकारात्मकता और प्रेरणा से वे खुद को साबित करने के लिए निरंतर राह खोजते रहे। इसी तलाश में वे ग्वालियर के लक्ष्मीबाई शारीरिक शिक्षा महाविद्यालय ग्वालियर में एक वरिष्ठ तैराक के साथ पहुंचे। वहां उनका परिचय डॉ. व्ही के डबास से हुआ जो पैरालंपिक तैराकी के अंतर्राष्ट्रीय कोच हैं।
समर्पण और अनुशासन ने पहुंचाया शिखर पर
संकल्प को जीने वाले पैरास्वीमर सतेन्द्र के कोच डॉ डबास ने सतेन्द्र के जज्बे, हिम्मत और अनुशासन को कुछ दिन की पूल प्रैक्टिस में कसौटी पर कसा। सतेन्द्र की निष्ठा और समर्पण से वे कोच डबास सर की निगाह में आए। उन्होंने अन्य दिव्यांग तैराकों के साथ सतेन्द्र को तैराकी के अंतर्राष्ट्रीय मानकों अनुसार नियमित ट्रेनिंग दी जिसके बाद सतेन्द्र ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे तैराकी प्रतियोगिताओं में मैडल जीतने लगे जिससे उनका हौंसला बड़ता गया।
उनकी तैराकी उपलब्धियों ने उन्हें 2014 में मध्यप्रदेश का सर्वोच्च खेल पुरस्कार विक्रम अवार्ड दिलाया। उन्हें शासकीय सेवा मिली मगर जब उन्हें तैराकी के कड़े और नियमित अभ्यास में इससे बाधा आयी तो उन्होंने तैराकी के लिए ग्वालियर में नौकरी को अलविदा कह दिया हालांकि निरंतर उपलब्धियों से जब स्थितियां अनुकूल र्हुइं और तत्कालीन इंदौर कलेक्टर श्री पी नरहरि से प्रोत्साहन मिलने पर वे इंदौर में फिर शासकीय सेवा से जुड़कर तैराकी में जुटे रहे।
मंजिल की रुकावटों को पहचानकर जीती जंग
अपने उस फैसले के बारे में वे कहते हैं कि मुझे मंजिल पता थी इसलिए मैं उसमें रुकावटों को पहचान रहा था। मुझे समंदर में तिरंगा लहराना था। मैंने घंटों तैरता रहता जिससे आगे समंदर में मुकाबले के समय शरीर थके नहीं। सतेन्द्र ने डॉ. डबास के मार्गदर्शन एवं अपने वर्तमान कोच रोहने मोरे के निर्देशन में 10 से 12 डिग्री सेल्सियस वाले इंग्लिश चैनल में उतरने के लिए लगातार अभ्यास किया। बर्फीले पानी में तैर तैरकर शारीरिक क्षमताएं बढ़ाईं। सतेन्द्र सिंह लोहिया ने 2018 में मेहनत और समर्पण से 12.36 घंटे में 36 किलोमीटर तैरकर आखिर इंग्लिश चैनल पार करके देश भर में सुर्खियां बंटोरी थीं।
उन्होंने मेहगांव, ग्वालियर, मप्र से लेकर देश के खेल जगत में उनका नाम हो गया। वे बिना रुके तैरते रहे और तैराकी में हर दिन सीखते रहे। 18 अगस्त 2019 में उनकी तैराकी ने इतिहास रच दिया था। वे भारत के 4 अन्य दिव्यांग तैराकों के साथ बर्फीली लहरों वाले कैटलीना चैनल को पार करने में सफल हुए थे। बर्फीले समंदर में 35 किलोमीटर की दूरी को 11.34 घंटे में तय करने वाले वे एशिया के पहले और इकलौते दिव्यांग तैराक बने थे। वे अब अंतर्राष्ट्रीय तैराकी में भारत का नाम रोशन करना चाहते हैं।
माइकल फेल्प्स को अपनी प्रेरणा मानते हैं लोहिया
अपने लक्ष्य पर चलते हुए उन्होंने महान अमरीकी ओलंपियन तैराक माइकल फेल्प्स को अपनी प्रेरणा बताया है। सत्येन्द्र सिंह लोहिया कहते हैं कि माइकल फेल्प्स निसंदेह दुनिया के महान तैराक हैं। मैं भी ओलंपिक मैं भारत के लिए उनकी जैसी स्वर्णिम सफलता पाने का सपना देखता हूं। मुझे माता पिता, मेरे कोच व्ही के. डबास, वर्तमान कोच रोहन मोरे मप्र के संवेदनशील मददगार अफसर पी. नरहरि सर सहित अनेक दोस्तों और साथियों ने निरंतर प्रेरणा और उर्जा दी है।
मैं मेरे और उन सबके सपने जल्दी से जल्दी साकार करना चाहता हूं। वे कहते हैं कि कैटलीना और 2026 में अब न्यूजीलैण्ड के कुक स्ट्रेट के बर्फीले समंदर को जीतने के बाद भी दूसरे समंदरों को जीतने की ललक मुझमें बेसब्री से बाकी है आगे अब मैं दुनिया के हर समंदर पर अपने देश का तिरंग लहराना चाहता हूं।
विवेक कुमार पाठक
स्वतंत्र लेखक
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