नित्य संदेश। बहुत पहले की बात नहीं, शहर से तक़रीबन 30 किलोमीटर दूर एक छोटे से गाॅंव के कच्चे-पक्के मकानों के दरमियां एक तंग सी गली में "निज़ाम" का परिवार रहता था। उसके दो बेटे थे, बड़ा बेटा "रहमत अली" और उसका छोटा भाई "नबील"। बाप मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का गुज़र बसर करता था।
"रहमत अली,बड़ा होने के नाते, तालीम में बेहद होशियार था। मगर घर की तंगदस्ती ने उसके, क़दम तालीम में आगे बढ़ने नहीं दिए,, उसने तालीम से किनारा कर के अपने वालिद के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। और यह इरादा किया कि अपने छोटे भाई को बेहतर से बेहतर तालीम देकर कोई इंजिनियर या अधिकारी बनाएगा। वो अब "नबील" के लिए बाप की ज़िम्मेदारी बन गया था। दोस्त भी और उस्ताद भी। उम्र में सिर्फ़ ''पाॅंच'' साल का फ़र्क़ था। मगर हालात ने "रहमत" को वक़्त से पहले ही बड़ा बना दिया था।
"रहमत अली" सुबह अज़ान से पहले उठ जाता। नमाज़ पढ़कर एक कप फीकी चाय पीता और फिर शहर की एक नामी फर्नीचर बनाने वाली कंपनी में मज़दूरी करने के लिए निकल जाता। उसके हाथों में छाले, पैरों में सूजन,, चेहरे पर धूप की स्याही, मगर आँखों में एक ही ख़्वाब चमकता था- “मेरा भाई पढ़-लिख जाए, अफ़सर बने, किसी के आगे हाथ न फैलाए।”
"नबील" उस वक़्त स्कूल में पढ़ता था। किताबों का बोझ उसके कंधों पर नहीं,, "रहमत अली" के दिल पर था। वह अपने लिए न तो अच्छा लिबास,न एक जोड़ी जूते सालों तक भी नहीं खरीदता, मगर "नबील" की कॉपी-किताब, अच्छी ड्रेस, बेहतरीन जूते, कभी अधूरे नहीं होने देता। जब "नबील" इम्तिहान में अच्छे नंबर लाता,, "रहमत अली" की आँखें चमक उठतीं,, जैसे उसकी अपनी मेहनत का इन्आम मिल गया हो।
रात को जब "नबील" पढ़ते-पढ़ते थक जाता,, तो रहमत अली उसके पास बैठकर कहानियाँ सुनाता--बहादुर बादशाहों की, ईमानदार फ़क़ीरों की, और उन लोगों की जो मेहनत से अपनी क़िस्मत बदल लेते हैं। वह हर कहानी के आख़िर में एक ही बात दोहराता,,,
“बेटा, इल्म सबसे बड़ा हथियार है। इसे थाम लोगे तो दुनिया तुम्हारे आगे झुक जाएगी।”
"नबील" उस वक़्त अपने बड़े भाई को फरिश्ता समझता था। उसे लगता था कि बड़े भाई "रहमत अली" की दुनिया में कोई ग़म नहीं, कोई थकान नहीं। मगर सच्चाई उसके बिल्कुल उलट थी।"रहमत अली" अपने दर्द को अपने लबों की मुस्कान के पीछे छुपा लेता था।
साल दर साल गुज़रते गए। "नबील" ने शहर के नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला लिया। गाॅंव से बाहर जाना पड़ा। "रहमत अली, रात दिन काम करने लगा। ताकि नबील" की फ़ीस और रहने का इंतज़ाम हो सके। जब "नबील" गाॅंव से शहर के लिए जाने लगा,, तो "रहमत अली" ने उसके माथे पर हाथ रखकर कहा,,
*“मेरे सपनों को अपनी आँखों में बसाकर ले जा। मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं होगी,, बस तू कामयाब हो जाए।”*
कॉलेज की दुनिया "नबील" के लिए बिल्कुल नई थी--बड़ी-बड़ी इमारतें और उनके बड़े-बड़े कमरे,, चमकदार कपड़े, अंग्रेज़ी बोलने वाले दोस्त, और ऊँचे सपने। उन सब के दरमियां, धीरे-धीरे उसकी ज़बान बदलने लगी। उसके रहन-सहन में नफ़ासत आ गई। और उसके दिल में एक नई दुनिया बसने लगी।जहाँ उसे अब "रहमत अली" की सादगी कुछ अजीब सी लगने लगी।
तालीम पूरी हुई। "नबील" को एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। तनख़्वाह ऐसी कि गाॅंव के लोग हैरान रह जाएँ। "रहमत अली" ने मोहल्ले में मिठाई बाँटी, सजदे में सिर रखकर अल्लाह का शुक्र अदा किया। उसने सोचा, “आज मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मुराद पूरी हो गई।” अल्लाह ने मेरी मेहनत क़ुबूल कर ली।
"नबील" जब पहली बार नौकरी से छुट्टी लेकर घर आया,, तो उसकी चाल में गुरूर था,, लिबास में ठाठ, और बातों में शहरीपन। "रहमत अली" उसे सीने से लगाना चाहता था,, मगर "नबील" ने बस रस्मी, सा हाथ मिलाया। "नबील" धीरे-धीरे तरक्की करने लगा और वक़्त के साथ-साथ "नबील" की मुलाक़ातें कम होने लगीं। फ़ोन पर बात होती भी तो जल्दी में,,
“हाँ भैया, सब ठीक है… अभी मीटिंग है… फिर बात करेंगे।”
"रहमत अली" हर बार दिल को समझा लेता, *“अपना छोटा तो बड़ा आदमी बन गया है,, काम का दबाव होगा।”
एक रोज़ की बात है। "रहमत अली" की तबीयत अचानक बिगड़ गई। पड़ोसियों ने "नबील" को इत्तिला दी। उसने चंद पैसे भेज दिए, मगर ख़ुद नहीं आया। कहा,।“अभी बहुत ज़रूरी प्रोजेक्ट है, छुट्टी नहीं मिल सकती।”
"रहमत अली" ने बिस्तर पर पड़े-पड़े छत को देखते हुए सोचा,,
“शायद अब मैं उसकी दुनिया का हिस्सा नहीं रहा।”*
सालों बाद "नबील" की शादी हुई। उसने शहर के एक बड़े होटल में शानदार रिसेप्शन रखा। "रहमत अली" को न्योता तो मिला,, मगर उसे किनारे की एक मेज़ पर बैठा दिया गया,, जहाँ दूर-दूर तक अजनबी चेहरे थे। जब किसी ने पूछा,
“ये आपके साथ कौन साहब बैठे हैं?”
"नबील" ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा,,
“ओह… ये… गाँव में हमारे खेत खलिहानों की देखभाल करते हैं।”
"नबील" का यह जुमला उसके दिल पर खंजर के मानिंद लगा। मानो उसके दिल में कुछ टूट सा गया हो। "मगर उसने आँसू नहीं बहाए। उसने चुपचाप खाना खाया, दुआ दी और वापस अपने गाॅंव लौट आया।
वक़्त गुजरता गया। "रहमत अली" वक़्त के साथ बूढ़ा हो गया। उसकी पीठ झुक गई, आँखों की रोशनी कम हो गई, मगर दिल में "नबील" के लिए दुआएँ अब भी ज़िंदा थीं।
एक दिन यकायक "नबील" की नौकरी चली गई। बिज़नेस में घाटा हुआ,, दोस्त दूर हो गए,, और शहर की चमक फीकी पड़ गई। उसे याद आया वह साया,, जो बचपन में धूप में उसके साथ-साथ चलता था। उसका बड़ा भाई। अब उसे फिर से गाॅंव की याद आने लगी।
वह दौड़ता हुआ गाॅंव पहुँचा। मगर "रहमत अली" अब इस दुनिया में नहीं था। पड़ोसियों ने बताया कि कुछ दिन पहले ही वह ख़ामोशी से। "इस "दुनिया ए फ़ानी से रुख़्सत हो गया,, उसके होंठों पर आख़िरी वक़्त भी "नबील" का नाम था।
"नबील" ने उस कच्चे से मकान के दरवाज़े पर बैठकर सिर पकड़ लिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसे याद आया हर वह लम्हा, जब "रहमत अली" ने अपनी ख़ुशियाँ कुर्बान की थीं, अपनी ज़िंदगी उसके नाम कर दी थी। अपनी तमाम ख्वाहिशें मार ली थी।
आज वह अफ़सर था,, मगर उस साये के बिना,, जिसने उसे धूप से बचाया,, जिसने माॅं- बाप की तमाम ज़िम्मेदारियों को निभाया,,हर छोटी बड़ी ख़ुशी दी। वो ही साया उसके सर से दूर हो गया इतना दूर कि उससे मिल पाना मुमकिन नहीं है।
*"क़ब्र पर खड़े होकर "नबील" ने काँपती आवाज़ में कहा,,*
*“भैया… मैं आपको वक़्त रहते पहचान नहीं पाया।"*
आप मेरा साया थे,, और मैं ही उस साये को भूल गया।”
हवा बिल्कुल शांत थी। मानो पूरे आलम में जैसे एक सिसकी गूँज रही हो। शायद "रहमत अली" की रूह ने बस इतना कहा हो--
*“मैं तो हमेशा तेरा ही रहा, छोटे…तू ही उस चकाचौंध भरी दुनिया में मुझे भूल गया।”*
शेर--
*हमने अपना ख़ूॅं बहा कर उसको सींचा था मगर*
*वो बड़ा हो के शज़र छांव कहीं ओर दे गया*
लेखक- साजिद अली सतरंगी"
फ़ोन -9457530339
बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी। ऐसी कहानियाँ हम सबके इर्द-गिर्द बिखरी हुई हैं। आपने अत्यंत संवेदनशीलता से दो भाइयों के रिश्ते को जीवंत किया है। हार्दिक बधाई ❤️ 🎉 🎉
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