Breaking

Your Ads Here

Saturday, February 14, 2026

डील को बेहतर समझने के लिए फसल के आधार पर जानना जरूरी

 


नित्य संदेश। भारत और अमेरिका के बीच एक 'अंतरिम' (interim) ट्रेड डील या फ्रेमवर्क पर समझौता जारी है, इस द्विपक्षीय वार्ता में रोज नए बदलाव हो रहे है। 6 फरवरी को पहले संयुक्त ब्यान जारी किया गया, जिसमें 10 फरवरी को कुछ बड़े बदलाव हुए। कृषि उत्पाद से दालों का नाम हटा दिया गया। इसके अलावा कई शब्दों में बदलाव हुए है। कल से सूचना आ रही है कि टेक्सटाइल में भी अमेरिका भारत को बांग्लादेश के बराबर लाभ देगा, यानी कपड़ों में 0 प्रतिशत ड्यूटी से भारत को बड़ा लाभ होगा, जिसका फायदा कपास के किसानों को मिलेगा। इसलिए अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी ।

डील के पक्ष या विरोध में केवल अंदाज के आधार पर प्रतिक्रिया आ रही है लेकिन इसे साबित करने के लिए अभी कोई साक्ष्य नहीं है । कुछ लोग किसानों को बरगलाने का कार्य कर रहे है। हमारी किसान भाइयों से अपील है कोई भी निर्णय सुनकर नहीं अपनी समझ के आधार पर ले। यह डील को बेहतर समझने के लिए फसल के आधार पर जानना जरूरी है। अमेरिका ने भारत के सामानों पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत होना भारतीय निर्यातकों के लिए निश्चित तौर पर राहत है। कुछ भारतीय कृषि उत्पादों के लिए यह बहुत अच्छी ख़बर है। बासमती चावल भारत की पहचान है और अमेरिका में इसकी बहुत माँग है। 202 4-25 में भारत ने 304.78 मिलियन डॉलर का बासमती चावल अमेरिका को निर्यात किया। अब कम टैरिफ से यह और सस्ता हो जाएगा और मांग बढ़ेगी। पंजाब और हरियाणा, उत्तर प्रदेश के बासमती उगाने वाले किसानों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। मसालों की बात करें तो भारत का मसाला निर्यात 2024-25 में 36,765 करोड़ रुपये का था। अमेरिका में भारतीय मसालों की बड़ी मांग है, खासकर होटल और रेस्तरां उद्योग में। हल्दी, मिर्च, जीरा, काली मिर्च, इलायची - ये सब अब अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी होंगे। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु के मसाला किसानों के लिए यह अच्छी खबर है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारत कुछ अमेरिकी कृषि और खाद्य उत्पादों पर शुल्क घटाएगा या सीमित मात्रा में आयात की अनुमति देगा, जबकि मांस, डेयरी, अनाज और अन्य संवेदनशील फसलों में घरेलू किसानों के हित सुरक्षित रखे गए हैं। अमेरिका भी कपड़ा, चमड़ा और अन्य भारतीय उत्पादों पर शुल्क घटाने को तैयार हुआ है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारत कई अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों और कुछ कृषि व खाद्य वस्तुओं पर शुल्क घटाएगा या खत्म करेगा। संयुक्त बयान के मुताबिक इसमें DDGs (पशु चारे में इस्तेमाल होने वाला प्रोटीन), लाल ज्वार, मेवे, ताजे और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स समेत कुछ अन्य उत्पाद शामिल हैं।

सार रूप में कहा जाए तो यह व्यापारिक व्यवस्था धान उत्पादक, निर्यात–उन्मुख, संगठित और बड़े/मध्यम किसानों के लिए अवसर है, जबकि छोटे दलहन–तेलहन किसानों के लिए जोखिम बन सकती है। यदि नीतिगत संरक्षण (MSP, आयात शुल्क, उत्पादन प्रोत्साहन) मजबूत रहे तो कमजोर वर्ग भी लाभान्वित हो सकता है अन्यथा लाभ असमान रूप से वितरित रहेगा। डील में सोयाबीन के तेल को आयात की बात पर कई समूह आपत्ति जता रहे है लेकिन यहां यह भी देखना होगा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक देश है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% खाद्य तेल इंडोनेशिया, मलेशिया,अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन जैसे देशों से बड़ी मात्रा में 80-85 लाख टन,पाम ऑयल,सोयाबीन तेल 50-55 लाख टन, सूरजमुखी तेल 28-30 लाख टन खरीदता है।

स्पष्ट है कि वर्तमान में खाद्य तेल आ ही रहा है। मेवे में बादाम, अख़रोट भी हम संयुक्त अरब अमीरात से खरीद रहे है। प्रीमियम फैसले खाने वाले की आय पर निर्भर होती है। फलों को अगर हम सीजन के बाद और एक निश्चित दर न्यूनतम आयात दर पर खरीदते है तो किसान को कोई नुकसान नहीं होगा। आज भी भारत सेब तुर्की से खरीद रहा है। भारत में अमेरिकी वाइन का उपयोग केवल एक विशेष वर्ग में होता है। विशेषज्ञ गैर-शुल्क बाधाओं में बदलाव पर नजर रखने की सलाह दे रहे हैं। भारत को चाहिए कि किसान हित में गैर शुल्क बाधाओ में कोई बदलाव नहीं करे। सरकार के पास अपने किसानों को बचाने का यही हथियार है। हम इससे मात्रात्मक प्रतिबद्ध लगा सकते है, टैरिफ कोटा तय कर सकते है, सांस्कृतिक आधार पर किसी उत्पाद को प्रतिबंधित कर सकते है। भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक सरकार से मांग करती है भारत सरकार इस डील में किसान हितों पर कोई समझौता नहीं करे।

लेखक

कालू प्रधान 

भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक

जिलाध्यक्ष मेरठ

No comments:

Post a Comment

Your Ads Here

Your Ads Here