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Tuesday, February 24, 2026

भाषा गतिरोध पैदा नहीं करती, बल्कि भाषा मानव की सामाजिकता का उत्पाद है: डा. अंजू




नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रथम सत्र की शुरुआत डॉ. मुनेश कुमार ने अतिथियों का स्वागत कर किया। इस सत्र में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। आशीष कुमार, शगुन बालियान, रुपेश कुमार यादव, प्रो. हरेंद्र सिंह, डॉ. देवानंद सिंह,भविष्य,गणेश कुमार ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सत्र की अध्यक्षता प्रो. राका आर्या, राष्ट्रीय विधि विश्विद्यालय, भोपाल द्वारा की गई। प्रो. जितेंद्र कुमार साहू, आचार्य, राजनीति विज्ञान विभाग, गौरबंग विश्विद्यालय सत्र के सह अध्यक्ष, डॉ. अंजू  मुख्य वक्ता एवं डॉ धनपाल डिस्कसेंट रहे ।

अपने उद्बोधन में डॉ. अंजू ने कहा कि भाषा गतिरोध पैदा नहीं करती बल्कि भाषा मानव की सामाजिकता का उत्पाद है। संस्कृति के संवर्धन एवं समझ के लिए भाषा का ज्ञान अति आवश्यक है। इसके पश्चात् डॉ. धनपाल, आचार्य, विधि विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय द्वारा  अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया गया और सत्र समापन की घोषणा की। सुमित देशवाल, शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा इस सत्र का मंच संचालन किया गया। इसके पश्चात् सम्मेलन के प्लेनरी सत्र का आयोजन, भारतीय भाषा परिवार में शोध कार्य विषय पर किया गया। डॉ. नरेंद्र तेवतिया ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि मनुष्य के विचारों एवं भावों के आदान प्रदान के माध्यम को भाषा कहते हैं और यह भारत की अद्भुत विविधता का प्रतीक है। इसके पश्चात इस सत्र की शुरुआत डॉ. नरेंद्र तेवतिया द्वारा अतिथि स्वागत एवं उनका परिचय कराया गया। विषय प्रवेश कराते हुए डॉ. नरेंद्र ने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं का प्राण है। संस्कृत भाषा को दिव्य वाणी के रूप में उल्लेखित कराते हुए सत्र की औपचारिक शुरुआत हुई। इसके पश्चात सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. वाचस्पति मिश्रा, पूर्व अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानम, लखनऊ ने अंग्रेजी एवं अन्य यूरोपीय भाषाओं में हिंदी एवं संस्कृत भाषाओं से ग्रहण किए गए शब्दों के आधार पर भारतीय भाषाओं की सनातनता का उल्लेख किया। इसके बाद डॉ. राजेश कुमार, सदस्य, एन सी ई आर टी, दिल्ली द्वारा अपने उद्बोधन में भाषाओं को हुई क्षति का उल्लेख किया गया। भारत में अनेक स्थानीय, क्षेत्रीय और कबीलाई भाषाएं विलुप्त हो गईं हैं अथवा विलुप्त होने के कगार पर हैं। इनके संरक्षण के लिए भारतीय भाषा समिति, एन ई पी एवं एन सी ई आर टी के प्रयासों पर भी चर्चा की।

तत्पश्चात अग्रिम वक्ता डॉ. नरेंद्र कुमार, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ ने अपने वक्तव्य में कहा कि निज भाषा उन्नति ही सभी भाषाओं की उन्नति का मार्ग है और यह आवश्यक है कि हम अपनी मातृभाषा के आधार पर ही अपनी पहचान बनाए। इसके बाद प्रोफेसर जितेंद्र साहू आचार्य गौरबंग विश्वविद्यालय मालदा पश्चिम बंगाल द्वारा एक उड़िया भाषा का उल्लेख करते हुये कहा कि ऐसा व्यक्ति जिसे अपनी मात्र भाषा से प्रेम नहीं हैं उसे अपनी माटी से भी प्रेम नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में जब संयुक्त राष्ट्र के 193 देशों में 150 देशों के मध्य युद्ध छिड़े हुऐ हैं। भारतीय संस्कृति में निहित वसुधैव कुटुंबकम् की भावना ने हमें शांतिप्रिय देश बनाएं रखा। भारत में इस सांस्कृतिक विविधता के बावजूद यह अपनी लोक भाषाओं के आधार पर एक विशिष्ठ पहचान बनाता है। उन्होने भारत के संविधान में निहित भाषाई बहुलवाद की स्वीकार्यता का उल्लेख करते हुए भारत की संवैधानिक व्यवस्था द्वारा भाषाओं को पोषण एवं संवर्धित करने के प्रयासों की सराहना की । उन्होंने भाषाई एकत्व एवं एकात्मता के संरक्षण के लिए प्रत्येक भारतीय क्षेत्रों में अंग्रेजी एवं हिंदी भाषा के अलावा स्थानीय भाषाओं को मान्यता देने पर बल दिया। इसके पश्चात् प्रो. वंदना शर्मा, आचार्या, हिंदी विभाग, एम एम महाविधालय, मोदीनगर द्वारा काव्य पाठ कर साहित्य विद्या की सृजनात्मकता एवं भावों के विभिन्न पहलुओं से सभागार में उपस्थित सभी सुधिजनों को अवगत कराया। प्लेनरी सत्र का समापन डॉ. चंचल चौहान, संकाय सदस्य, राजनीति विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा औपचारिक आभार वयक्त करते हुए मध्यान्ह भोजन के लिए सभी सभी को आमंत्रित किया। इस सत्र के संयोजक डॉ. विशाल शर्मा रहे।



दो दिवसीय सम्मेलन के अंतिम सत्र की शुरुआत डॉ. प्रशांत कुमार शर्मा द्वारा अतिथियों का औपचारिक परिचय कराया गया। तत्पश्चात बी. ए. द्वितीय वर्ष के छात्र श्रीजन अवस्थी द्वारा प्रतिवेदन प्रस्तुतीकरण किया गया। इस सत्र को आगे बढ़ाते हुए प्रो. जितेंद्र साहू ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस सम्मेलन की सार्थकता यह है कि जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हम स्वयं को एक पाते हैं। प्रो. राका आर्या ने समापन सत्र के वक्तव्य में  शोध की बारीकियों पर चर्चा की। प्रो. राका आर्या ने भारतीय भाषा परिवार : एकात्म और एकात्मता की भावना को हम सभी के अस्तित्व के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में भाषा शक्तियों के मध्य संघर्ष का माध्यम बन चुकी है। उन्होंने इंटरनेट के उपयोग और दुरुपयोग पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि शोध करते समय हमे पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए ।


इसके पश्चात् प्रो.मनोज दीक्षित , कुलपति, महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर (राजस्थान) ने कहा कि भारत भाषाओं का सबसे बड़ा गुलदस्ता है। पश्चिम के इस आग्रह से पार पाने की आवश्यकता है कि भारत में भाषाएं विघटनकारी घटक हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि भारत की भाषायी विविधता इसके विकास की पोषक है और यह अत्यंत गौरव का विषय है। सभी भारतीय भाषाओं के प्रति हमारा आग्रह हो व अन्य भाषाओं के प्रति पूर्वाग्रह भी न हो। इसके पश्चात् प्रो. एन. के. तनेजा, भूतपूर्व कुलपति, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय,मेरठ ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में पश्चिमी विमर्श की आलोचना करते हुए उस नकारात्मक विमर्श से बाहर निकलने का आग्रह किया। एकात्मता का विचार केवल भाषा तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरी वसुधा को कुटुंब मानती है। इतिहासकार आर्नोल्ड का उल्लेख करते हुए प्रो. तनेजा ने कहा कि जहां पश्चिमी दर्शन जिज्ञासाओं का समाधान ढूंढने में विफल हो जाता है वहीं भारतीय दर्शन उन  जिज्ञासाओं का आवश्यक समाधान प्रस्तुत किया।

तत्पश्चात प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि राजनीतिक दलों के आग्रह ने भाषाओं को निश्चित सीमा तक तिरस्कृत किया। उन्होने कहा कि 1956 में जब भाषायी आधार पर राज्यों का निर्माण किया गया तो उस प्रक्रिया ने राष्ट्रीय एकता और भाषायी एकता को प्रभावित किया और क्षति पहुंचाई। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिवेदन लेखन का कार्य शोधार्थी पुष्पेंद्र, अमित कुमार , आकाश गर्ग  एवं छात्र लक्ष्य कुमार, निशा रस्तोगी व श्रीजन अवस्थी ने किया।

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