नित्य संदेश। संक्रान्ति का शाब्दिक अर्थ है — सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुल 12 संक्रान्तियाँ होती हैं, जो प्रत्येक माह सूर्य के राशि परिवर्तन के साथ आती हैं। इन्हीं में मकर संक्रान्ति सनातन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पावन पर्व माना जाता है।
मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी दिन सूर्य का दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गमन होता है, जिसे अत्यंत शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सूर्य कर्क रेखा को छोड़कर मकर रेखा में प्रवेश करते हैं। उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है, इसलिए इस काल में स्नान, दान, तप, जप और सभी मांगलिक कार्यों का आरंभ होता है।
मकर संक्रान्ति का आध्यात्मिक महत्व भी विशेष है। मान्यता है कि इसी दिन महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह ने इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त होने के कारण अपने प्राण त्यागे थे। इसके साथ ही माँ गंगा का सागर से मिलन भी इसी दिन हुआ, जिससे गंगासागर का विशेष धार्मिक महत्व स्थापित हुआ।
यह पर्व पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ करने का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि इस दिन पिता और पुत्र के संबंधों में मधुरता आती है, आपसी मेल-मिलाप और सम्मान बढ़ता है। यह पर्व हमें रिश्तों को समझने, संवारने और मजबूत बनाने की प्रेरणा देता है।
मकर संक्रान्ति के अवसर पर खिचड़ी, तिल और गुड़ के लड्डू बनाने और बांटने की परंपरा है। तिल और गुड़ का संयोजन यह संदेश देता है कि जीवन में चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हमें एक-दूसरे से जुड़े रहकर मिठास बनाए रखनी चाहिए। तिल की तरह कठोर परिस्थितियों में भी गुड़ जैसी मिठास घोलने की सीख यह पर्व देता है।
सार रूप में, मकर संक्रान्ति केवल एक तिथि या पर्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक समरसता और पारिवारिक प्रेम का संदेश देने वाला उत्सव है। यह पर्व हमें सकारात्मक ऊर्जा, एकता और सद्भाव के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
— मीना
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