प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान
नित्य संदेश, मेरठ। भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली एक जटिल सामाजिक ढांचे के भीतर कार्य करती है, जो इतिहास, जातिगत पहचान, आरक्षण नीतियों और समानता, योग्यता तथा अवसरों पर चल रही बहसों से प्रभावित है। एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, आरक्षण व्यवस्था और यूजीसी इक्विटी कमेटी जैसे तंत्र ऐतिहासिक अन्याय और भेदभाव को कम करने के उद्देश्य से बनाए गए थे।हालाँकि, इन व्यवस्थाओं पर सामाजिक तनाव, कथित असमानता, प्रशासनिक जटिलताओं और परिसर-स्तरीय विवादों के संदर्भ में निरंतर बहस होती रही है।
एक वैकल्पिक प्रस्ताव के रूप में खंडित संस्थागत संरचना (Segmented Institutional Model) का विचार सामने आता है, जिसमें प्रत्येक संस्थान के भीतर आरक्षण लागू करने के बजाय कुछ प्रमुख संस्थानों को विशिष्ट सामाजिक वर्गों (SC, ST, OBC, General) के लिए अलग-अलग नामित किया जाए। यह लेख उसी मॉडल, उसके उद्देश्यों, संभावित लाभों और महत्वपूर्ण चिंताओं पर चर्चा करता है।इस प्रस्ताव के अनुसार निम्न प्रकार के संस्थानों को अलग-अलग सामाजिक वर्गों के लिए निर्धारित किया जा सकता है:
* केंद्रीय विश्वविद्यालय
* मेडिकल कॉलेज
* इंजीनियरिंग कॉलेज
* AIIMS संस्थान
* IIT एवं अन्य राष्ट्रीय महत्व के संस्थान
उदाहरण के रूप में:
AIIMS दिल्ली SC/ST केंद्रित संस्थान,
अन्य AIIMS OBC केंद्रित संस्थान,
अन्य AIIMS सामान्य वर्ग केंद्रित संस्थान
इस संरचना के अंतर्गत:
* छात्र, प्रोफेसर, नर्सिंग स्टाफ, पैरामेडिकल स्टाफ, प्रशासनिक कर्मचारी, सुरक्षा कर्मी आदि उसी सामाजिक वर्ग से होंगे जिसके लिए संस्थान निर्धारित है।
* संस्थान के भीतर जातिगत विविधता न्यूनतम होगी।
* आंतरिक आरक्षण व्यवस्था की आवश्यकता कम या समाप्त हो सकती है।
यह प्रस्ताव कुछ प्रमुख मान्यताओं पर आधारित है:
समर्थकों का मानना है कि जब सभी सदस्य एक ही सामाजिक वर्ग से होंगे तो जाति-आधारित तनाव, भेदभाव के आरोप और आपसी विवाद कम हो सकते हैं। छात्र और कर्मचारी स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस कर सकते हैं, क्योंकि वे साझा सामाजिक पृष्ठभूमि वाले वातावरण में होंगे।
* जटिल आरक्षण गणना की आवश्यकता कम
* रोस्टर प्रणाली और पदोन्नति विवादों में कमी
* जाति-आधारित शिकायत निवारण तंत्र पर कम दबाव
यदि परिसर में जाति-आधारित विवाद कम होते हैं, तो सैद्धांतिक रूप से:
* SC/ST एक्ट की आवश्यकता
* UGC इक्विटी कमेटी की भूमिका
कम हो सकती है
संस्थान विशेष समुदायों के उत्थान पर केंद्रित हो सकते हैं:
* मेंटरशिप
* समुदाय-केंद्रित शोध
* नेतृत्व विकास
परिसर वातावरण कम जातीय तनाव
प्रशासन नीतियों का सरल क्रियान्वयन
सामाजिक आत्मविश्वास पहचान-आधारित सशक्तिकरण
शैक्षणिक ध्यान विवादों पर कम समय
यह मॉडल सामंजस्य और सुरक्षा का लक्ष्य रखता है, लेकिन यह कई गंभीर प्रश्न भी उठाता है।
भारतीय संविधान समानता, गैर-भेदभाव और सामाजिक एकता पर आधारित है। जाति के आधार पर संस्थागत पृथक्करण को समावेशन से अधिक विभाजन के रूप में देखा जा सकता है, जिसके लिए गहन संवैधानिक समीक्षा आवश्यक होगी।
शिक्षण संस्थान केवल पढ़ाई के केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे स्थान हैं जहाँ:
* विभिन्न वर्गों का मेलजोल होता है
* पूर्वाग्रह टूटते हैं
* राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है
विभाजन अल्पकाल में तनाव कम कर सकता है, परंतु दीर्घकाल में सामाजिक दूरी बढ़ा सकता है। विविध सामाजिक दृष्टिकोण शोध, चिकित्सा निर्णय, इंजीनियरिंग नवाचार और सामाजिक विज्ञानों में विचार समृद्ध करते हैं। समान पृष्ठभूमि वाले संस्थान बौद्धिक विविधता को प्रभावित कर सकते हैं। छात्रों की पसंद अकादमिक रुचि के बजाय वर्ग के आधार पर सीमित हो सकती है!
आंतरिक प्रणाली सरल होगी, परंतु राष्ट्रीय स्तर पर:
* संसाधनों का समान वितरण
* संकाय गुणवत्ता
* संस्थानों की प्रतिष्ठा में अंतर से बचाव
जैसे मुद्दे जटिल हो सकते हैं।
* क्या विभाजन भेदभाव को समाप्त करेगा या केवल सीमा बदल देगा?
* क्या यह अन्याय कम करेगा या पहचान-आधारित संरचना को स्थायी बना देगा?
* क्या साझा संस्थानों के बिना राष्ट्रीय एकता मजबूत हो सकती है?
खंडित संस्थागत मॉडल उच्च शिक्षा में समानता तंत्र को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयास है, जिसका उद्देश्य आंतरिक जातीय तनाव और प्रशासनिक विवादों को कम करना है। परंतु यह मॉडल गंभीर संवैधानिक, सामाजिक और शैक्षणिक चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करता है।
किसी भी बड़े परिवर्तन से पहले आवश्यक होगा:
* संवैधानिक समीक्षा
* राष्ट्रीय स्तर पर नीति विमर्श
* शैक्षणिक प्रभाव अध्ययन
* नैतिक विश्लेषण
उच्च शिक्षा में समानता का भविष्य न्याय, योग्यता, गरिमा और सामाजिक एकता के संतुलन पर आधारित होना चाहिए।
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