सपना सीपी साहू
नित्य संदेश। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणाम 14 नवंबर को घोषित हो चुके है जिससे राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय लिखा जा चुका है। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ( एनडीए) ने 243 सीटों में से 206 सीटें जीतकर 2010 का अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया और प्रचंड बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इसके विपरीत, महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस-वामपंथी) मात्र 32 सीटों पर ही सिमटकर रह गए, जो अत्यधिक प्रयासों के बाद भी उसकी सबसे करारी हार को दर्शाता है।
वोट प्रतिशत की दृष्टि से, एनडीए को 47.2% मत मिले, जबकि महागठबंधन को 37.3% मत मिले, यानी लगभग 10 प्रतिशत का बड़ा अंतर रहा है। इतना सशक्त जनादेश स्पष्ट रूप से एनडीए का सुशासन, सुरक्षा और महिलाओं के जीवन में आए स्थायी बदलाव की निरंतरता पर मुहर लगाता है। वैसे देखा जाए तो एनडीए की रणनीति, कार्यकर्ताओं की जी तोड़ मेहनत और महिलाओं का साथ ही इस जीत का सबसे बड़ा कारक बना है। एनडीए को जीताने वाले कारक में महिलाएं अग्रणी व निर्णायक वोट बैंक बनी है। यह महिला जागरण राजनीति में आधी आबादी के उभरते प्रभाव की निर्णायक शक्ति का दर्शन है। कुल मतदान 67.13% रहा है, लेकिन महिलाओं का मतदान 71.78% रहा, जो पुरुषों के 62.98 प्रतिशत से 8.8 प्रतिशत अधिक था। यहां आंकड़े बताते है कि लगभग 4 लाख से ज़्यादा महिला मतदाताओं ने पुरुषों से आगे बढ़कर मतदान किया था। देखने में आया है कि आठ ज़िलों की 53 सीटों पर महिलाओं का मतदान योग 53-55% तक पहुंचा। इन महिला-प्रधान जिलों में, जेडीयू का वोट प्रतिशत मात्र 23.8% तक ही रहा, जो सामान्य जिलों के 15.7% से लगभग दोगुना था।
महिलाओं के इस मजबूत समर्थन का आधार नीतीश कुमार की सुशासन और सम्मान वाली योजनाएं रही। बिहार की महिलाओं को मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना (दशजारी), उज्ज्वला, हर घर नल का जल, शौचालय और पंचायतों में 50% आरक्षण जैसी मूलभूत सुविधाओं से उनके दैनिक जीवन में स्थायी सुधार और सामाजिक सम्मान मिलने से नीतीश कुमार पर विश्वास स्थायी रहा है। एनडीए की जीत पर विपक्ष का कहना है कि महिलाओं के खाते में जो मुख्यमंत्री रोजगार योजना के नाम पर दस-दस हजार रुपये गए है उसके कारण महिलाओं ने एनडीए को वोट किया है जबकि यह पूर्ण सत्य नहीं है। ऐसे तो विपक्षी जेडीयू ने ₹3,000 मासिक भत्ते और प्रत्येक घर से एक सरकारी नौकरी का प्रलोभन दिया था जिसे महिला मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से नकार दिया। उन्होंने जंगलराज की वापसी के डर और सुरक्षा की गारंटी को प्राथमिकता देते हुए एनडीए के पक्ष में स्पष्ट मतदान किया है।
महिला जनादेश के साथ एनडीए की जीत के तीन मुख्य स्तंभ और रहे है जिनमें जातिगत समीकरण, युवा मतदाता और मजबूत संगठन शक्ति भी प्रमुख रही है। यूं तो बिहार में जातिगत मतगणना हुई जिसमें अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) की 36% आबादी ने अपने 70% से अधिक वोट एनडीए को देकर विश्वास जताया है। चिराग पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेएपी) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) की वापसी ने गठबंधन को मज़बूत किया, जिससे इन दोनों पार्टियों ने कुल 23 सीटें जीतीं। जो एनडीए की बड़ी उपलब्धि साबित हुआ है।
बिहार जनादेश में युवा बनाम स्थिरता का दौर भी देखने को मिला। हालांकि विपक्ष ने जेन जेड में रोज़गार को लेकर आक्रामक प्रचार प्रसार किया, लेकिन बिहार के युवाओं 60% युवाओं ने इतिहास को नहीं बिसराया और कट्टा-दुनाली-रंगदारी (अपराध) के पुराने दौर को पुनः न लाने तथा स्थिरता और सुरक्षा को प्रथम प्राथमिकता दी।
इस प्रचंड जीत में एनडीए का संगठनात्मक बल विशेष रूप से सक्रिय रहा। 1.76 लाख बूथ कार्यकर्ताओं के साथ बूथ स्तर पर अभूतपूर्व सहयोग दिखाया। प्रधानमंत्री मोदी जी का राष्ट्रवाद और 'राष्ट्र प्रथम' का भावनात्मक जुड़ाव भी महत्वपूर्ण साबित हुआ। साथ ही अमित शाह की 36 जनसभाएं, कई रोड़ शो, वही योगी जी की 31 रैलियां और 1 रोड़ शो ने भी जनता में एनडीए के लिए विश्वास जताया। एनडीए की इस जीत से बिहार में बहार है, नीतीश कुमार है अब दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने के ऐतिहासिक प्रबल दावेदार है।
दूसरी और बिहार जनादेश में विपक्ष को नकारने के कारण महागठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा है। जेडीयू और कांग्रेस के गठबंधन को बिहारी जनमानस ने सीरे से खारिज कर दिया है। इसके लिए उनकी आत्म-निर्मित गलतियां कारक बनी है। महागठबंधन की हार रणनीतिक गलतियों, अभद्र भाषा और अविश्वसनीयता के कारण स्वयं द्वारा खोदे गए गड्ढे का परिणाम रही।
सबसे पहला कारण तो अभद्र और अपमानजनक भाषा बनी है। जिसमें बिहारी, सनातनियों के महापर्व छठी मैया के अपमान, राम मंदिर के अपमान से लेकर प्रधानमंत्री जी की मां को भी आरजेडी नेताओं द्वारा अपमानजनक टिप्पणियां सम्मिलित है। बिहार की जनता संस्कारी है वह मां, माटी, मान्यताओं से जुड़ी है। मां और देवी मां का अपमान संस्कारी बिहारियों ने सही नहीं माना। छठ व्रत (छठी मैया) को राहुल गांधी द्वारा अंधविश्वास कहकर या आरजेडी के जगदानंद सिंह, फतेह बहादुर सिंह ने राम मंदिर को विवादों की भूमि और खेसारी लाल यादव के राम मंदिर क्या प्रोफेसर बना देगा या रोज़गार देगा? जैसे बयानों को 85% हिंदू आबादी ने सांस्कृतिक आस्था पर चोट के रूप में देखा।
यूं तो विपक्ष ने मुफ्त रेवड़ी के नाम पर महिलाओं को तीन हजार रुपये प्रतिमाह और सरकारी नौकरी का प्रलोभन दिया पर जनता ने नाकामयाब कर दिया। महागठबंधन ने 10 लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया, लेकिन कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दिया। जनता ने ध्यान रखा जो 15 साल में नहीं कर पाए वे 5 साल में कैसे करेंगे? जनता के इस सवाल ने वादे की विश्वसनीयता को शून्य कर दिया। बिहार की जनता अब तक लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाला और जंगलराज नहीं भूली है। एनडीए ने अपराध, गुंडागर्दी और रंगदारी की पुरानी यादों को लगातार उजागर किया। महिलाएं और युवा सुरक्षा के डर से सुरक्षित विकल्प की तलाश में रहे है।
महागठबंधन में नेतृत्व और गठबंधन में कमी रही। तेजस्वी यादव जंगलराज के वारिस की छवि को तोड़ने में विफल रहे। वही लालू का गृहक्लेश जिसमें तेज प्रताप यादव का अलग होना, नवरात्रि में मांस भक्षण करते हुए वीडियों डालना। आरजेडी में सीट बंटवारे को लेकर अंदरूनी खींचतान जारी रही और कांग्रेस के बड़बोलापन तो बिहारियों को इतना नागवार गुजरा कि वोट शेयर 2020 के 9.5% से गिरकर 7.9% तक पहुंच गया। बिहार की जनता ने बड़ी ही खामोशी से एनडीए की जीत और महागठबंधन की बड़ी हार पर मुहर लगाकर सुशासन 2.O पर विश्वास जताया है।
सुशासन 2.0 की राह -बिहार 2025 के जनादेश ने एक साफ़ संदेश दिया है। जनता प्रलोभन (मुफ्तखोरी) नहीं, बल्कि परिणाम, सुरक्षा और सम्मान चाहती है। महिलाओं ने सुशासन की निरंतरता को चुनकर इस संदेश को सबसे मुखरता से व्यक्त किया है। यूं तो एनडीए के समक्ष अब मुख्य चुनौतियां हैं। 7.6% की वर्तमान बेरोज़गारी दर को कम करना और अगले 5 वर्षों में विकास दर को 8% तक पहुंचाना अनिवार्य होगा क्योंकि एनडीए का वादा है कि विकसित बिहार होगा। वही महागठबंधन के लिए आत्ममंथन आवश्यक है कि आगे अभद्र भाषा का त्याग कर एक विश्वसनीय और व्यवहारिक आर्थिक रोडमैप प्रस्तुत करना सीखे। सनातन धर्म का अपमान करकर महागठबंधन जीत नहीं सकता। क्योंकि भारत में राजनीति की धार्मिक गलियारों से गुजरकर ही मंजिल पर पहुंचती है। यह जनादेश समावेशी बिहार और सुशासन की निरंतरता का प्रतीक भी है। बिहारियों ने स्पष्ट कर दिया है- जंगलराज नहीं, बिहार में सुशासन चाहिए।
लेखिका
सपना सीपी साहू
इंदौर, मध्य प्रदेश
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