नित्य संदेश डेस्क। दुख की बात है कि शहर क़ाज़ी प्रोफेसर जैनुस्साजिदीन हमारे बीच नहीं रहे दुआ हे खुदा उनकी मग़फिरत करे क़ाज़ी साहब के इंतकाल के बाद जिस तरह से मेरठ शहर के दो गुट के लोगों ने क़ाज़ी के ओहदे का मज़ाक बनाया है निहायत अफसोस की बात है कि शहर क़ाज़ी की तदफीन से पहले ही उनके बेटे को शहर क़ाज़ी का ताज पहना दिया तो दूसरे गुट ने अलग खुद ही शहर क़ाज़ी का ऐलान कर दिया इस तरह शहर क़ाज़ी के इस ओहदे का दोनों गुटों ने मखौल उड़ाया है ज़ेरे गौर यह भी है कि क्या यह दोनों ही इसके अहल (लायक़) है ?
IAS का बेटा IAS नहीं हो सकता डॉ का बेटा डॉ नहीं हो सकता इंजीनियर का बेटा इंजीनियर नहीं हो सकता बाप की डिग्री तक पहुंचने के लिए बेटे को पढ़ना होगा.
क़ाज़ी इस्लामी न्यायाधीश होते हैं क़ाज़ी बनने के लिए इस्लामी क़ानून (शरिया), इस्लामी न्याय शास्त्र (फ़िकाह), क़ुरान व हदीस के ज्ञान और उसूल (सिद्धांत)की पूरी समझ होनी चाहिए इस लिहाज़ से (मुफ्ती की डिग्री) वाले व्यक्ति को ही शहर क़ाज़ी बनना चाहिए ?
9 जुलाई 1880 में सरकार ने शहर क़ाज़ी की नियुक्ति के संबंध में "क़ाज़ी अधिनियम 1880 की धारा 2 " के तहत सरकार को जिम्मेदार मुसलमानो के मशवरे के बाद क़ाज़ी नियुक्त करना होता हे ये अलग बात हे कि सरकार इस नियुक्ति पर हस्तक्षेप नहीं करती। क़ानूनी ओर शरई हैसियत से शहर क़ाज़ी की नियुक्ति के लिए मुफ़्ती की तालीमी सनद (डिग्री) हासिल करना भी ज़रूरी है.
हमारी मांग है कि मेरठ महानगर के शहर क़ाज़ी के पद पर शरीयत और क़ानून के मुताबिक क़ाबिल और इसके अहल तालीम याफ़्ता की ही नियुक्ति होनी चाहिए शहर के तमाम मुस्लिम ज़िम्मेदारान से हमारी अपील है कि दोनों गुट के शक्ति प्रदर्शन में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के लोग अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं यह राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बंद होना चाहिए
मेरठ शहर के तमाम बिरादरी के ज़िम्मेदारान की मौजूदगी में क़ाबलियत के एतबार से फैसला होना चाहिए व मज़हबी पेशवाओं और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों का भी हस्तक्षेप (दखल अंदाजी) करना भी मुनासिब होगा
लेखक
फ़ज़ल करीम
पार्षद, सदस्य कार्यकारणी
नगर निगम मेरठ
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