नित्य संदेश। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक सामाजिक ,सांस्कृतिक और सेवा - उन्मुख संगठन के रूप में भारतीय समाज में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। संघ की कार्यसंस्कृति का प्रमुख आधार व्यक्ति - निर्माण, सामाजिक समरसता, राष्ट्रबोध और सेवा की भावना है। संगठन का दीर्घकालिक उद्देश्य भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय जीवन मूल्यों के आधार पर "सुदृढ़ एवं संगठित समाज का निर्माण करना है।"
समकालीन में भारत तीव्र आर्थिक विकास की दिशा में अग्रसर है। देश की बढ़ती आर्थिक क्षमता ,आधारभूत संरचना ,तकनीकी प्रगति, नवाचार तथा विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती वैश्विक भूमिका समृद्धि एवं आत्मनिर्भर भारत की संभावनाओं को रेखांकित करती है। ऐसे परिवेश में राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए सामाजिक सहभागिता और सेवा -भाव की भूमिका "और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।" संघ "भारत के परम वैभव के ध्येय को केंद्र में रखकर समाज के विभिन्न वर्गों में संगठन ,सेवा, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है।" संघ के दृष्टि में राष्ट्र की प्रगति आर्थिक उन्नति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक आत्म - बोध, नैतिक मूल्यों और नागरिक दायित्वों की सक्रियता भी संघ का अभिन्न हिस्सा है। इस दृष्टि से सेवा भाव राष्ट्र -निर्माण की एक महत्वपूर्ण आधारशिला के रूप में देखा जा रहा है।
मानवीय जीवन एवं नागरिक समाज में सेवा कृपा नहीं ,बल्कि कर्तव्य बोध, दायित्व बोध, आत्मीयता और लोक कल्याण की साधना है। हर नागरिक का दायित्व है कि सेवा -भाव से राष्ट्र की समृद्धि में योगदान दे और समाज को संकटों से मुक्त करने का सतत् प्रयास करें। मानव जीवन की आधारशिला "गहरी आत्मीयता एवं अपनेपन की भावना पर टिकी है।" सामयिक में सामाजिक जीवन में इस भावना को "और अधिक प्रगाढ़ बनाने की आवश्यकता है।" संघ की परंपराओं, संस्कारों और कार्य प्रणाली में सेवा भाव को विशेष महत्व दिया गया है। संघ की दृष्टि में सेवा केवल सहायता का माध्यम नहीं ,बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन का महत्वपूर्ण साधन है।
पूज्यनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी,आचार्य माधव सदाशिव राव गोलवरकर जी, ' 'गुरुजी ' ,नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी ,गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर जी एवं अनेक संत- महापुरुषों के सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शन में भी सेवा एवं कर्तव्य मानव कल्याण की भावना को उच्चतम मूल्य प्राप्त है। राष्ट्र -निर्माण की प्रक्रिया में हर नागरिक अपने कर्तव्यों को प्राथमिकता दे और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव विकसित करे,यह वर्तमान की महत्वपूर्ण आवश्यकता हैं। वर्तमान में आवश्यकता इस बात की है कि हम विश्व कल्याण ,मानवता की सेवा, वसुधैव कुटुंबकम एवं नर सेवा ही नारायण सेवा जैसे भारतीय जीवन मूल्यों को अपने आचरण का आधार बनाएं। सेवा -भाव व्यक्ति को समाज से जोड़ता है, सामाजिक समरसता को मजबूत करता है और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को मजबूती प्रदान करता हैं।संघ की कार्य परंपरा में सेवा को इसी व्यापक दृष्टि से देखा गया है । व्यक्ति का स्वभाव भगवान शिव के समान लोक मंगलकारी हो जो ज्ञान ,त्याग , प्रेम, सरलता एवं सेवा का प्रतीक हों।
भारतीय दर्शन एवं सनातन परंपरा में सेवा भाव को मानव जीवन के उच्चतम मूल्य में स्थान प्राप्त है। वैदिक एवं उपनिषद साहित्यों में "सेवा -भाव को आत्मिक उन्नति, सामाजिक समरसता तथा समस्त प्राणी जगत के कल्याण का साधन मानता है।" उपनिषदों की अद्वैत चेतना में प्रत्येक जीव में आत्मतत्व के दर्शन की प्रेरणा देती है। श्रीमद् भागवत गीता में निष्काम कर्म के माध्यम से अहंकार एवं फलासक्ति के त्याग को सेवा का आधार माना गया है। भारतीय संत परंपरा ने भी ईश्वर साक्षात्कार एवं आत्म कल्याण का सहजतम मार्ग स्वीकार किया है। संघ ने सामाजिक समरसता के माध्यम से जातिगत भेदभाव एवं सामाजिक विषमता से ऊपर उठकर समाज की एकात्मकता, सहयोग और समानता को मजबूत करने का प्रयास किया है। करुणा ,विनम्रता, सहिष्णुता, प्रज्ञा और सेवा -भाव को आधार बनाकर लोक जागरण, सेवा कार्यों, व्याख्यानों एवं कार्यशालाओं के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन तथा सामाजिक एकता को प्रोत्साहित किया है। संघ के पंचम सरसंघचालक पूजनीय के .सी सुदर्शन जी ने भी सामाजिक कुरीतियों को संगठित एवं सशक्त समाज के निर्माण में बाधक मानते हुए उनके निराकरण पर बल दिया था। संघ का व्यापक दृष्टिकोण "एक सशक्त, संगठित एवं सशक्त राष्ट्र- निर्माण में है जहां किसी भी व्यक्ति में उच्च- नीच का भेदभाव ना हों और सभी को समान अधिकार, सम्मान एवं अवसर मिलें।"
संगठित समाज ही अपनी समस्याओं का प्रभावी समाधान कर सकता है। भारतीय परंपरा में समय-समय पर महापुरुषों एवं पुरुषार्थ व्यक्तियों ने समाज को संगठित और जाग्रत कर राष्ट्र जीवन को नई दिशा प्रदान की। इसी क्रम में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने औपनिवेशिक काल में ' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की स्थापना कर समाज में राष्ट्रीय चेतना का संचार किए और 'परम वैभवशाली भारत' के निर्माण का संकल्प जगाया। राष्ट्र -निर्माण के लिए बड़े पद एवं विशिष्ट दायित्व आवश्यक नहीं होते; बल्कि अपने निर्धारित दायित्व का निष्ठा, समर्पण और कर्तव्य- बोध के साथ निर्वहन राष्ट्र निर्माण की मजबूत आधारशिला होती है। हर नागरिक अपने कार्य क्षेत्र में ईमानदारी ,लगन और सत्यनिष्ठा से योगदान देकर राष्ट्र की प्रगति में सहयोगी बन सकता हैं।
शिक्षा राष्ट्र -निर्माण का एक पवित्र एवं प्रभावी माध्यम है। शिक्षा के माध्यम से केवल ज्ञान का प्रसार ही नहीं होता, बल्कि विद्यार्थियों में चरित्र ,अनुशासन, कर्तव्य -बोध ,राष्ट्र निष्ठा, कर्तव्य निष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे जीवन मूल्यों एवं आदर्शों का भी विकास होता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 इसी व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप छात्रों के सर्वांगीण विकास ,भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्य परख शिक्षा का उन्नयन कर रहा है। शिक्षक अपने ज्ञान, पवित्र आचरण, उत्तम चरित्र एवं संस्कारों के माध्यम से विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं, तथा उनमें राष्ट्र के प्रति समर्पण, सेवा एवं उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत करते हैं। शिक्षा एवं शिक्षक मिलकर ऐसे सभ्य नागरिकों का निर्माण करते हैं, जो अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहते हुए " भारत के सशक्त, समृद्ध और गौरवशाली भविष्य के निर्माण में सक्रिय सहयोग दे सके।"
स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन ही सशक्त सेवा भाव का आधार है। योग, साधना,ध्यान एवं ज्ञान के माध्यम से शरीर, मन और आत्मबल को मजबूत कर भारत माता के प्रति सेवा -भाव जाग्रत किया जा सकता है । यही समर्पित सेवा राष्ट्र- निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देती है। भारत और उसके पड़ोसी देशों में भूकंप,बाढ़ ,चक्रवात, महामारी एवं भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कठिन समय में स्वयंसेवकों ने निःस्वार्थ सेवा भाव से मानवता की सेवा की है। सेवा आत्मीयता और परोपकार हर व्यक्ति का अभिन्न शील गुण होना चाहिए।
निष्कर्षत: सेवा- भाव कर्तव्य, निष्ठा, समर्पण और लोक कल्याण के प्रति दायित्वबोध की प्रेरणा देता है तथा नर -सेवा को जीवन- साधना का स्वरूप प्रदान करता है।
प्रोफेसर (डॉ.) बलराम पाणी
डीन ऑफ कॉलेजेज, दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली।

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