दो मंजिला घर और मैं
बचपन से ही मेरे मन में 'दो-मंजिला' घरों के प्रति बड़ा आकर्षण था, स्थानीय भाषा में ऊपर के छतवाले हिस्से को 'ढाबा' और ऊपर की खुली छत को 'चाँदनी' कहते हैं, 'ढाबे' और 'चाँदनी' वाले घरों में ऊपर जाकर देखने की बड़ी उत्सुकता रहती थी।
अक्सर जाकर देखता भी था, अधिकांश जगह 'ढाबे' पर अटाला रखा होता, 'चाँदनी' पर गंदगी, धूल पसरी होती, लेकिन मेरे मन में उनका आकर्षण कभी कम नहीं हुआ।
हमारा अपना घर, व्यवस्थित, पर्याप्त किन्तु एक मंजिला खपरैल वाला था जिसकी छत पर जाना असंभव था, मेरे मन में अपना 'दो-मंजिला' घर होने की बड़ी लालसा थी।
समय बीतता गया, लालसा बनी रही। पुराने शहर को विस्थापित होना था इसलिए वहाँ घर के विस्तार और 'दो-मंजिला' बनाने का औचित्य नहीं था, विस्थापन के बाद नई जगह पर बड़ा और व्यवस्थित, लेंटर वाला 'पक्का घर' बना, यहाँ ऊपर बड़ी खुली छत 'चाँदनी' थी, लेकिन 'ढाबा' बनाने का काम हमने छोड़ दिया था, 'ढाबे' की बात फिर आगे बढ़ गई।
1 या 2 वर्षों के बाद हमारे यहाँ ऊपर की छत पर एक और मंजिल बनाने का काम शुरू हुआ, यानि अपने घर में 'ढाबा' अब साकार हो रहा था, बड़ी खुशी थी ऊपर के कमरे की खिड़की से बाहर के दृश्य देखने की।
ऊपर का काम पूरा होने से पहले मुझे नौकरी के लिए घर छोड़कर जाना पड़ा, यानि 'ढाबा' फिर दूर हो गया।
नौकरी के लिए कई नगरों में लगभग दर्जनभर घर किराए से लिए, संयोग से किराए के घरों में भी 'ढाबे' पर रहने का सौभाग्य नहीं मिला, सभी जगह नीचे के मंजिल पर ही रहना हुआ ।
कुछ वर्षों के बाद परिवार के आर्थिक सहयोग से इन्दौर नगर में अपना 'घर' ख़रीदा, बिना 'ढाबे' का 'चाँदनी' वाला। खरीदते समय ही निश्चित किया कि अगले महीने ही ऊपर एक और मंजिल बनवाना है, पुनः अपने घर में 'ढाबा' दिखाई देने लगा, इस योजना को मूर्तरूप लेने में पुनः 10 वर्ष लग गए, आखिर..... ऊपर की मंजिल का काम शुरू हुआ, ऊपर की छत डली और ययोग से मुझे नई नौकरी के लिए इन्दौर छोड़ना पड़ा।
नई नौकरी मुम्बई महानगर में है जहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें है, मेरा ऑफिस भी 11वें और 12वें माले पर है, यहाँ रहने की व्यवस्था ढूँढ रहा था, 10 - 12 दिनों के बाद एक 5 मंजिला सोसाइटी में प्लेट पसन्द आया, किराया, दूरी, अन्य व्यवस्था आदि सभी तरह से मनमाफिक, किन्तु 'ग्राउंड फ्लोर' पर।
अपना पैतृक घर तीन मंजिला हो चुका है, उधर इन्दौर में 'ढाबे वाला' अपना घर भी तैयार है और मैं मुम्बई में अपने इस ग्राउंड फ्लोर के घर की खिड़की से पास की बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स देखता हूँ।
संभवतः यह धरती माँ का मेरे प्रति स्नेहभाव है जो मुझे अपनी गोद में ही रखना चाहती है, यही कारण है, मुझे हमेशा जमीन पर ही गद्दा डालकर सोना अच्छा लगता है।
—अखिल गौतम


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