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Saturday, October 10, 2026

गंगा की मिट्टी से सजेगी आदिशक्ति, बाजार में इको-फ्रेंडली मूर्तियों की धूम



-कुम्हारों की आंखों में मिट्टी और चाक का इंतजा, प्रशासन के दावे हुए हवाई


लियाकत मंसूरी

नित्य संदेश, मेरठ। रविवार से शारदीय नवरात्र का आगाज होने जा रहा है। इससे पहले ही सोतीगंज का प्रसिद्ध मिट्टी चौक और मूर्ति बाजार पूरी तरह से मां दुर्गा की मूर्तियों से सज गया है। इस बार बाजार का ट्रेंड बदला हुआ है। लोगों में चाइनीज और केमिकल कलर वाली मूर्तियों के बजाय गंगा की मिट्टी से बनी, नेचुरल कलर वाली भारतीय मूर्तियों की मांग सबसे ज्यादा है।


बाजार में 50 रुपये की छोटी मूर्ति से लेकर 25,000 रुपये तक की बड़ी और आकर्षक मूर्तियां उपलब्ध हैं। सबसे ज्यादा मांग एक फीट से लेकर दो फीट तक की मूर्तियों की है, जो घरों और छोटी झांकियों के लिए सबसे उपयुक्त मानी जा रही हैं। सोतीगंज स्थित अजंता मूर्ति कला केंद्र इस बाजार का प्रमुख केंद्र है। इसके स्वामी अमन प्रजापति बताते हैं कि इस कारोबार की नींव उनके पिता राकेश प्रजापति ने रखी थी। आज यह सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि परिवार की परंपरा बन चुका है, जिससे पूरा परिवार जुड़ा हुआ है। अमन के अनुसार, इस साल ग्राहक सबसे ज्यादा कटिंग फिनिश और नेचुरल कलर वाली मूर्तियों को पसंद कर रहे हैं, जो देखने में बेहद सौम्य और आकर्षक लगती हैं।



बाजार में रौनक, पर कुम्हारों के चेहरे पर चिंता

बाजार की इस चमक के पीछे कुम्हारों का संघर्ष भी छिपा है। सबसे बड़ी समस्या है - मिट्टी। अमन प्रजापति बताते हैं, "पहले हमें गंगा की चिकनी और उपजाऊ मिट्टी आसानी से मिल जाती थी, जिससे मूर्ति मजबूत और चमकदार बनती थी। लेकिन अब प्रशासन की रोक और खनन बंद होने से गंगा की मिट्टी मिलना लगभग बंद हो गया है।" मजबूरी में कारीगरों को पोखर और तालाब की मिट्टी, जिसे स्थानीय भाषा में 'चौक मिट्टी' कहा जाता है, से काम चलाना पड़ता है। लेकिन इस साल बरसात ज्यादा होने से पोखर-तालाबों में लबालब पानी भरा है, इसलिए वह मिट्टी भी निकालना मुश्किल हो गया है। मिट्टी की किल्लत और महंगाई का सीधा असर मूर्तियों की लागत पर पड़ रहा है।


कागजों पर योजनाएं, धरातल पर शून्य

मिट्टी के साथ-साथ सरकारी उपेक्षा ने भी कुम्हारों की कमर तोड़ रखी है। कारीगरों का आरोप है कि माटीकला बोर्ड और कुम्हार सशक्तिकरण योजना के नाम पर सिर्फ दावे किए जा रहे हैं। अमन का कहना है कि "सरकारी योजना धरातल पर बिल्कुल शून्य है। हम दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, लेकिन अधिकारी नहीं मिलते। सुनवाई नहीं होती। कई बार सर्वे हुआ, फॉर्म भरवाए गए, चाक देने का वादा किया गया, लेकिन आज तक एक भी कारीगर को इलेक्ट्रिक चाक नहीं मिला। प्लॉट देने की बात भी सिर्फ घोषणा बनकर रह गई।



कब तक जिंदा रहेगी पारंपरिक कला

नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना के लिए बाजार तो सज गया है, लेकिन सवाल यह है कि अगर इसी तरह मिट्टी के लिए जूझना पड़ा और सरकारी मदद नहीं मिली, तो मिट्टी को आकार देकर उसमें जान फूंकने वाली यह पारंपरिक कला कब तक जिंदा रह पाएगी।

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