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Thursday, October 1, 2026

सामवेद की दशमी कथा - चतुर्थ दिवस

 


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। निज निवास 11-जी, विक्टोरिया गार्डन में चल रही सामवेद की दशमी कथा के चतुर्थ दिवस पर कथाव्यास पारुल मित्तल ने नवम प्रपाठक के अंतर्गत अग्नि की कथा का वाचन किया। "हे अग्निदेव" के मधुर गुञ्जार के साथ कथा का प्रारम्भ स्तुति, गान और आशीर्वाद के प्रसंग से हुआ।


कथाव्यास ने बताया कि अग्नि यज्ञ में होता रूप में विराजमान हैं। वे ज्ञानी, जातवेदस्, ज्येष्ठ, शक्तिशाली और अत्यंत प्रकाशमान हैं, जो घी की आहुति से और अधिक दीप्त होते हैं। हम अपने श्रेष्ठ कर्म, परम भाव और प्रिय वस्तुओं को घी के रूप में अग्नि को समर्पित करते हैं। कुल्हाड़ी और वन के दृष्टांत से समझाते हुए उन्होंने कहा कि वन कठिन बाधाएं, विरोधी शक्तियां और अज्ञान का प्रतीक है, तो अग्नि ऊर्जा, ज्ञान, चेतना और प्रकाश रूपी कुल्हाड़ी है जो इन बाधाओं को काटती है। जो जागता है, वही ऋचाओं को और वही साम को प्राप्त करता है। कथा में बताया गया कि उषा अग्नि की बहन है और वायु अग्नि का मित्र है। साथ ही जल और अग्नि के गूढ़ संबंध पर भी प्रकाश डाला गया। इस प्रकार गान-प्रधान सामवेद की कथा का सुंदर वाचन संपन्न हुआ।


कथा के अंत में सामवेद के मंत्रों का सस्वर पाठ किया गया -

वात आवातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे।
प्र ण आयूंषि तारिषद्दिने दिने॥20॥

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