चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में ‘मंजर काज़मी की कहानियाँ’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। आज का कार्यक्रम ऐतिहासिक महत्व का है। मंजर काज़मी बड़े कहानीकार थे। प्रगतिवाद के दौर में विकसित होने वाले मंजर काज़मी धार्मिक शैली के साथ हमें बेहतरीन कहानियाँ देकर गए। उनकी कहानियाँ बिल्कुल अनोखी होती थीं। मंजर काज़मी अपने दौर के बड़े कहानीकार थे। उनकी कहानियों में प्रतीकात्मकता निरंतर उभरती चली जाती है। उनके छोटे-छोटे संकेतों को समझने की आवश्यकता है।
ये विचार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सगीर अफ़राहीम ने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग और आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘मंजर काज़मी की कहानियाँ’ विषयक ऑनलाइन कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि जब मुझे मेरठ में मंजर काज़मी पुरस्कार मिला था, तो उस समय मुझे इसलिए अधिक खुशी हुई थी क्योंकि मंजर काज़मी अपने दौर के बड़े कहानीकार थे। उन्होंने प्रतीकों के माध्यम से आम जनता पर होने वाले अत्याचारों को उजागर किया। मंजर काज़मी की कहानियों को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की आवश्यकता है।
इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ मोहम्मद ईसा राणा ने पवित्र कुरआन की तिलावत से किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता के दायित्व का निर्वहन प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. सगीर अफ़राहीम ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. ज़ैन रामिश, अध्यक्ष, उर्दू विभाग एवं डीन, कला संकाय, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हज़ारीबाग ने ऑनलाइन सहभागिता की। वक्ताओं के रूप में डॉ. अख्तर आज़ाद, सहायक प्रोफेसर, टी.एन.बी. कॉलेज, भागलपुर तथा डॉ. परवेज़ शहरीयार, प्रसिद्ध कथा-आलोचक, एनसीईआरटी, नई दिल्ली ने सहभागिता की। इस अवसर पर लखनऊ से आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन भी उपस्थित रहीं। स्वागत एवं परिचयात्मक वक्तव्य शोधार्थी सैयदा मरियम इलाही ने दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. इरशाद स्यानवी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन मोहम्मद नदीम ने किया।
कार्यक्रम का परिचय देते हुए प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि आज का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आज डॉ. मंजर काज़मी की जयंती है। डॉ. मंजर काज़मी असाधारण कहानीकार थे। उन्होंने अनेक कहानियाँ लिखीं, लेकिन ‘सियाह ग़िलाफ़ काले जनरल’ ऐसी कहानी है कि पाठक उसमें पूरी तरह खो जाते हैं। आधुनिकतावाद के दौर में डॉ. मंजर काज़मी ने महत्वपूर्ण कहानियाँ लिखकर साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया।
डॉ. परवेज़ शहरीयार ने कहा कि डॉ. मंजर काज़मी आधुनिकतावाद के प्रमुख समर्थक थे। उन्होंने प्रतीकात्मक कहानियों में अपनी एक अलग राह बनाई। उनका विशिष्ट शैली-विन्यास ख़लील जिब्रान से मिलता-जुलता है। बड़े शिक्षक की तरह मंजर काज़मी बड़े कहानीकार और साहित्यकार थे। एक अच्छा शिक्षक वही होता है जो सिद्धांत के साथ-साथ उसे व्यवहार में करके भी दिखाए और ऐसे शिक्षकों में डॉ. मंजर काज़मी का स्थान महत्वपूर्ण है।
डॉ. अख्तर आज़ाद ने कहा कि डॉ. मंजर काज़मी आधुनिक कहानीकारों की उस पीढ़ी से संबंध रखते थे, जब आधुनिकतावाद अपने अंतिम चरण में था, लेकिन उन्होंने उर्दू साहित्य-जगत को बेहतरीन कहानियाँ दीं। उनकी एक विशिष्ट विशेषता यह भी है कि बयालीस वर्षों के दौरान साहित्यिक सेवाओं के साथ-साथ उन्होंने पचपन कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियों का संबंध इस्लाम धर्म से रहा है। इस्लामी विषयों पर कहानियाँ लिखना एक कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है और यह काम मंजर काज़मी ने उत्कृष्ट शैली के साथ किया। उनकी अधिकांश कहानियाँ इस्लामी विषयों पर आधारित हैं।
मुख्य अतिथि प्रो. ज़ैन रामिश ने कहा कि डॉ. मंजर काज़मी आलोचक, कहानीकार और साहित्यकार होने के साथ-साथ अन्य कई महत्वपूर्ण विशेषताओं के भी धनी थे। डॉ. मंजर काज़मी ने बेहतरीन कहानियाँ और आलोचनात्मक लेख लिखकर पाठकों को चौंकाने का काम किया। हालांकि, उनकी पुस्तक ‘अतराफ़-ए-ग़ज़ल’ ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया। इस पुस्तक में उर्दू ग़ज़ल की शैली और परंपरा देखने को मिलती है, जो उर्दू शायरी की सबसे लोकप्रिय विधाओं में से एक है। बहुत से लोग उर्दू ग़ज़ल की शुरुआत अरबी से मानते हैं, लेकिन मेरा विचार है कि उर्दू शायरी की शुरुआत फ़ारसी से हुई। फ़ारसी और उर्दू शायरी की परंपरा ने ग़ज़ल की विधा को समृद्ध किया है।
कार्यक्रम से डॉ. अलका वशिष्ठ, मोहम्मद शमशाद, सईद अहमद सहारनपुरी, फरहत अख्तर, महविश, नायाब सहित अनेक छात्र-छात्राएँ ऑनलाइन एवं ऑफलाइन जुड़े रहे।

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