भारत वह है, जो हम हैं’, भारतीय ज्ञान परंपरा हमारी सोच और जीवन-दृष्टि में समाहित : प्रो. गौतम आर. देसिराजू
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन विज्ञान, शिक्षा एवं नवाचार से जोड़ने के उद्देश्य से चल रही विशेष व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत सत्यजीत रे ऑडिटोरियम में एक ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के प्रख्यात वैज्ञानिक एवं लेखक प्रो. गौतम आर. देसिराजू विशिष्ट अतिथि (वक्ता), प्रति-कुलाधिपति मेज. जन. (डॉ.) जी.के. थपलियाल, एसएम (सेनि.), कुलपति प्रो. (डॉ.) वी.के. मित्तल, प्रो. (डॉ.) अनोज राज, डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी, कर्नल राजेश त्यागी(सेनि.), प्रो. (डॉ.) भावना ग्रोवर मुख्य रूप में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा परंपरागत दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात अतिथियों का स्वागत किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। “Indian Knowledge Systems” विषय पर अपने प्रभावशाली व्याख्यान में प्रो. गौतम आर. देसिराजू ने भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यापक स्वरूप को सरल एवं रोचक ढंग से समझाया। उन्होंने कहा कि ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ केवल तीन शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति, चिंतन और जीवन-दृष्टि का व्यापक दर्शन है। उन्होंने ‘भारतीय’, ‘ज्ञान’ और ‘परंपरा’—तीनों शब्दों की अलग-अलग व्याख्या करते हुए कहा कि ‘भारतीय’ केवल किसी भू-भाग की पहचान नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतना और जीवन-मूल्य का प्रतीक है, जो भारत की आत्मा को अभिव्यक्त करता है। वहीं ‘ज्ञान’ को उन्होंने केवल पुस्तकीय जानकारी तक सीमित न मानते हुए आत्मबोध, अनुभव, विवेक, तर्क और सत्य की खोज से जोड़ा। उन्होंने कहा कि ‘परंपरा’ पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ने वाले ज्ञान, संस्कारों, अनुभवों और जीवन-मूल्यों की निरंतर धारा है।
प्रो. देसिराजू ने कहा कि भारत को केवल भौगोलिक सीमाओं या मानचित्र के माध्यम से समझना पर्याप्त नहीं है। भारत हमारी सोच, संस्कार, आचरण, चेतना और जीवन-पद्धति में निरंतर मौजूद है। उन्होंने कहा, “भारत वह है, जो हम हैं।” उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने ज्ञान, संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं को अपने जीवन में आत्मसात करता है, तभी वह भारत की वास्तविक पहचान और उसकी ज्ञान परंपरा को समझ पाता है। भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य केवल अतीत को जानना नहीं, बल्कि उसमें निहित उपयोगी ज्ञान और जीवन-मूल्यों को वर्तमान संदर्भों में समझकर भविष्य के लिए उपयोगी बनाना है। विश्वविद्यालय के प्रति-कुलाधिपति मेजर जनरल प्रो. (डॉ.) जी.के. थापलियाल (सेवानिवृत्त) ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हजारों वर्षों से निरंतर विकसित होती रही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जीवन के विभिन्न आयामों को एक-दूसरे से जोड़कर देखने की दृष्टि मिलती है। उन्होंने कहा कि भारत ने प्राचीन काल से ही गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन, भाषा, वास्तु, योग और शिक्षा सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारतीय चिंतन में ज्ञान को केवल अर्जित करने की वस्तु नहीं माना गया, बल्कि उसे व्यक्ति, समाज और प्रकृति के कल्याण से जोड़कर देखा गया।
मेजर जनरल प्रो. (डॉ.) थापलियाल ने कहा कि सुभारती विश्वविद्यालय युवाओं को आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय संस्कारों एवं ज्ञान परंपरा से जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे भारत की समृद्ध ज्ञान विरासत को समझें, उस पर शोध करें और भारतीय चिंतन की वैज्ञानिक एवं मानवीय दृष्टि को विश्व के सामने प्रस्तुत करें। विश्वविद्यालय की मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रो. (डॉ.) शल्या राज ने कार्यक्रम के सफल आयोजन की शुभकामनाएं दी। कार्यक्रम के दौरान डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी ने विशिष्ट अतिथि वक्ता प्रो. गौतम आर. देसिराजू का परिचय कराया। उन्होंने प्रो. देसिराजू की वैज्ञानिक एवं लेखकीय उपलब्धियों तथा भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित उनके व्यापक अध्ययन पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. अनोज राज, ने सभी अतिथियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं आयोजन से जुड़े सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम की संयोजक डॉ. प्रीति सिंह रहीं। उनके समन्वय में कार्यक्रम का सफल आयोजन संपन्न हुआ। राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत वातावरण में ‘वंदे मातरम्’ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ

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