नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। किडनी हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह खून से गंदगी और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने और शरीर में जरूरी तत्वों का संतुलन बनाए रखने का काम करती है। जब किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है, तो इसे क्रॉनिक किडनी डिजीज कहा जाता है। गंभीर स्थिति में यह बीमारी किडनी फेलियर तक पहुंच सकती है। किडनी खराब होने पर पैरों, टखनों या चेहरे पर सूजन, लगातार थकान और कमजोरी, भूख कम लगना, मतली या उल्टी, सांस लेने में तकलीफ और पेशाब कम आने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, कई मरीजों में बीमारी काफी बढ़ने तक कोई खास लक्षण नजर नहीं आते। इसलिए समय-समय पर जांच और नेफ्रोलॉजिस्ट की सलाह लेना जरूरी है।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली में नेफ्रोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट मेडिसिन के डायरेक्टर प्रो. (डॉ.) विशाल सिंह ने बताया, "जब किडनी अपना जरूरी काम ठीक से नहीं कर पाती, तब मरीज को डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है। डायलिसिस शरीर से गंदगी और अतिरिक्त पानी निकालने में मदद करता है और मरीज की जान बचाने वाला इलाज है। हालांकि, यह किडनी फेलियर का स्थायी इलाज नहीं है और स्वस्थ किडनी के सभी कार्य पूरी तरह नहीं कर सकता।" कई उपयुक्त मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट लंबे समय तक बेहतर विकल्प हो सकता है। इसमें जीवित या मृत डोनर की स्वस्थ किडनी मरीज के शरीर में लगाई जाती है। सफल ट्रांसप्लांट के बाद मरीज अधिक सक्रिय जीवन जी सकते हैं और रोजमर्रा की गतिविधियों में लौट सकते हैं।
डॉ. विशाल सिंह ने कहा, "ट्रांसप्लांट की जांच और तैयारी के लिए कई वर्षों तक डायलिसिस का इंतजार करना जरूरी नहीं है। समय रहते मूल्यांकन कराने से मरीज अपने विकल्पों को बेहतर ढंग से समझ और योजना बना सकते हैं।" ट्रांसप्लांट के बाद भी नियमित दवाइयां, जांच और डॉक्टर से फॉलो-अप जरूरी होता है। सही समय पर इलाज और उचित देखभाल से किडनी फेलियर के मरीज भी लंबा और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

No comments:
Post a Comment