नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के लीगल स्टडीज संस्थान के सहायक प्रोफेसर आशीष कौशिक ने ब्राजील के इटाउना विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित वर्चुअल वर्ल्ड कांग्रेस में अपना व्याख्यान दिया। दुनिया भर के कानूनी विशेषज्ञों को संबोधित करते हुए प्रोफेसर कौशिक ने "भूल जाने का अधिकार: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का एक उभरता आयाम" विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि किस प्रकार आधुनिक तकनीक की स्थायी डिजिटल मेमोरी व्यक्तिगत गरिमा, गतिशील पहचान और व्यक्तिगत स्वायत्तता के लिए खतरा पैदा कर रही है। रोस्को पाउंड, जॉन लॉक और इमैनुएल कांत के दार्शनिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए उन्होंने जोर दिया कि प्राकृतिक रूप से भूलना मानव विकास के लिए आवश्यक है, जबकि स्थायी डिजिटल रिकॉर्ड अतीत की गलतियों के कारण जीवनभर सामाजिक कलंक का कारण बन सकते हैं।
यूरोपीय न्यायालय के 2014 के ऐतिहासिक 'गूगल स्पेन' फैसले और यूरोपीय संघ के जीडीपीआर (GDPR) के अनुच्छेद 17 से लेकर वैश्विक विकास को रेखांकित करते हुए, प्रोफेसर कौशिक ने वैधानिक डेटा संरक्षण की ओर भारत के बढ़ते कदमों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हालांकि 'जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी (2017)' मामले में अनुच्छेद 21 के तहत निजता को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया गया था, लेकिन अब भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 अपनी धारा 12 के तहत डेटा हटाने (Erasure), सहमति वापस लेने और डेटा न्यूनीकरण के अधिकारों को औपचारिक रूप से लागू करता है। उच्च न्यायालयों के परस्पर विरोधी फैसलों—जैसे निजता की सुरक्षा देने वाले निर्णय (जोरावर सिंह मुंडी) बनाम अदालती रिकॉर्ड की सार्वजनिकता बनाए रखने वाले निर्णय (धर्मराज भानुशंकर दवे)—का जिक्र करते हुए उन्होंने सार्वजनिक इतिहास के मनमाने संपादन को रोकने के लिए अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत व्यक्तिगत निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने का आग्रह किया।
एक व्यावहारिक संतुलन स्थापित करने के लिए प्रोफेसर कौशिक ने प्रमुख संरचनात्मक सिफारिशें प्रस्तुत कीं: डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड के माध्यम से आनुपातिकता परीक्षण (Proportionality Test) को अपनाना, गलत नीयत से दिए गए आवेदनों को रोकने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान लागू करना, और ऐतिहासिक रिकॉर्ड की सुरक्षा के लिए न्यायिक देखरेख में एक केंद्रीकृत ऑफलाइन डिपॉजिटरी (Centralized Offline Depository) बनाना। उन्होंने अपने संबोधन का समापन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि कानूनी प्रणालियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तकनीक मानव गरिमा की सेवा करे, जिससे हर व्यक्ति को सुधार करने, विकसित होने और एक नई शुरुआत करने का मौलिक अवसर मिल सके।

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