लियाकत मंसूरी
नित्य संदेश, मेरठ। आज देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। लाल किले की प्राचीर से तिरंगा लहरा रहा है, लेकिन इस तिरंगे और इस आजादी का सबसे गहरा नाता मेरठ की धरती से है। इतिहास कहता है कि जो चिंगारी 10 मई 1857 को मेरठ से दहकी थी, वही 90 साल तक सुलगती रही और 15 अगस्त 1947 को आजादी के शोले में बदल गई।
1857: मेरठ से शुरू हुई थी क्रांति: 10 मई 1857 को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए पहली चिंगारी मेरठ से उठी थी, जो लौ बनकर पूरे देश में फैलती रही। विद्वानों ने इसी दिन को भारतीय इतिहास में प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन कहा है।
क्रांति की शुरुआत का केंद्र था औघड़नाथ मंदिर (काली पलटन मंदिर): इतिहासकारों के अनुसार, संगठित रूप से लड़ा गया प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यहीं से शुरू हुआ था। कहा तो यह भी जाता है कि मंदिर के कुएं के एक घूंट पानी ने क्रांतिकारियों में आजादी का सैलाब ला दिया था, जिसने आग को ज्वाला बनाने के लिए घी का काम किया।
मेरठ में ही बना था आजाद भारत का पहला तिरंगा: बहुत कम लोग जानते हैं कि 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जो पहला तिरंगा फहराया था, वो भी मेरठ में ही बना था। आजादी की घोषणा के बाद जब राष्ट्रीय ध्वज तैयार कराने की बात आई, तो क्रांतिकारियों ने मेरठ के क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम में ध्वज तैयार कराने पर सहमति जताई। समिति के निर्देशन में नत्थे सिंह और उनकी टीम ने दिन-रात काम करते हुए सिर्फ 2 दिन में खादी का वह ऐतिहासिक तिरंगा तैयार कर सौंप दिया था, जो आजादी की सबसे बड़ी निशानी बना।
1857 से 1947 तक हर आंदोलन में रहा मेरठ: मेरठ का योगदान सिर्फ 1857 तक सीमित नहीं रहा। प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन से जो बीजारोपण मेरठ ने किया, वह 1947 में आजादी में तब्दील हो गया और इस पूरी यात्रा में मेरठ ने हर छोटे-बड़े आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई। आज भी मेरठ के संग्रहालय में 1857 से 1947 तक चले आंदोलन के अभिलेख, गजेटियर और 15 अगस्त 1947 को जारी डाक टिकट संजोए हुए हैं, जो इस शहर के अविस्मरणीय योगदान की गाथा सुनाते हैं।
आज 15 अगस्त पर जब पूरा देश जश्न-ए-आजादी मना रहा है, तो मेरठ सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि उस संकल्प की धरती है जहाँ से भारत ने गुलामी की जंजीरें तोड़ने का पहला साहस किया था।
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