नित्य संदेश
भारत में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा "नीट" में लगातार पेपर लीक और अनियमितताओं ने एक नए तरह के संघर्ष को जन्म दिया है। यह संघर्ष अब सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। राजनीतिक पंडितों की माने तो यह सीधे "छात्र राजनीति" और "सत्ता की राजनीति" के बीच 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले की निर्णायक जंग बन गया है। सवाल सीधा है, इस आंदोलन में जीत किसकी होगी?
पहला पक्ष: छात्र राजनीति
मुद्दे की ताकत छात्र राजनीति की ताकत उसकी नैतिकता और निरंतरता में है। नीट
से 24 लाख छात्र जुड़े हैं। हर छात्र के पीछे एक परिवार है जिसका सपना, पैसा और 2 साल दांव पर लगे हैं। छात्र आंदोलन तब
जीतेगा, जब वह 3 शर्तें पूरी करेगा।
1-यदि गैर-दलीय आंदोलन रहेगा: जब ABVP, NSUI, AISA जैसे छात्र संगठन बैनर भूलकर
सिर्फ "पारदर्शिता" पर एक मंच पर आएंगे।
2-छात्र एवं छात्राओं की मांगें स्पष्ट होगी-सिर्फ रद्द करो नहीं, बल्कि एनटीए में सुधार, समयबद्ध भर्ती, दोषियों को कठोर सजा और सीटें बढ़ाना।
3- आंदोलन में यदि निरंतरता बनी रहेगी: एग्जाम के बाद आंदोलन खत्म नहीं हो।
2027-28 तक दबाव बना रहे। अगर ऐसा हुआ तो इतिहास गवाह है कि जेपी आंदोलन से लेकर
मंडल आंदोलन तक, छात्र राजनीति ने सत्ता का रुख
बदला है। नीट के पास वो भावनात्मक पूंजी है। क्योंकि यह मिडिल क्लास केडॉक्टर बनने
के सपने से जुड़ा है।
दूसरा पक्ष: सत्ता की राजनीति
सिस्टम को हाईजैक करने की कलासत्ता की राजनीति के पास संसाधन, मीडिया और समय है। भाजपा और विपक्ष दोनों इसे अपने
तरीके से भुनाएंगे। सत्ता यानी भाजपा की रणनीति: "डैमेज कंट्रोल + नैरेटिव
शिफ्ट। सीबीआई जांच, गिरफ्तारियां, पेपर लीक रोकथाम कानून 2024 और NTA में बदलाव दिखाकर सरकार कहेगी
"हमने मजबूत एवं छात्र-छात्राओं के पक्ष में बडी कार्रवाई की। साथ में अककटर
और मेडिकल सीटें बढ़ाकर "समाधान भी हमने दिया। मकसद: मुद्दे को "कुछ
राज्यों के माफिया" तक सीमित करके केंद्र को बचाना।
विपक्ष यानी इंडिया गठबंधन की रणनीति: "इश्यू को जिंदा रखना"
विपक्ष इसे "युवा विरोधी सरकार" का सबसे बड़ा ईश्यू बनाएगा। संसद से
सड़क तक सोशल मीडिया, ट्वीट से रैली तक। 2024 में देश
में बेरोजगारी काम आई थी। 2029 में पेपर लीक के साथ बेरोजगारी का मुख्य मुद्दा
बनाएयेगा। खतरा: अगर विपक्ष सिर्फ इस्तेमाल करके नीति नहीं देगा तो छात्र उससे भी
मुंह मोड़ लेंगे।
आंदोलन का आगे का क्या हो सकता है भविष्य
आंदोलनों की सबसे बड़ी कमजोरी समय है। परीक्षा आते ही छात्र पढ़ाई में लग जाते
हैं। आंदोलन ठंडा पड़ जाता है। वहीं सत्ता के पास इंतजार करने का समय है। वह 2-3
महीने बाद नया मुद्दा, नई योजना और नया नैरेटिव ले
आएगी। 2029 का परिणाम 3 बातों पर तय करेगा।
सिस्टम सुधार : 2027 तक अगर एक भी बड़ा लीक हुआ तो सरकार की विश्वसनीयता खत्म, छात्र छात्राओं का ही नहीं बल्कि देश की अधिकतर जनता का भी भरोसा उठ जायेगा। आंदोलन को अगर छात्रों के अलावा कोई चेहरा नहीं मिला तो वह बिखर जाएगा।
वैकल्पिक मुद्दे : 2029 तक अगर महंगाई, युद्ध या धर्म जैसे मुद्दे हावी हुए तो नीट पीछे चला जाएगा। आंदोलन का कोई एकीकृत
राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं है, लेकिन नीट की आग बुझी नहीं है। वह राख में दबी है। अगर फिर
भविष्य में कोई गड़बड़ी हुई तो यही राख शोला बनकर 2029 का चुनाव तय करेगी। अगर
छात्र एकजुट रहे तो छात्र राजनीति जीतेगी। अगर छात्र बंटे तो सत्ता की राजनीति फिर
जीत जाएगी।
— अशोक सोम
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


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