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Friday, July 3, 2026

भरोसे के क़त्ल का मातमी मंज़र—साजिद अली सतरंगी

नित्य संदेश

आज़ के दौर में मुहब्बत के नाम पर भरोसे का क़त्ल बड़ी सूझबूझ और इत्मीनान के साथ किया जा रहा है।

एक बात आमतौर पर साफ़ कर देना चाहता हूॅं। "जब मुहब्बत हथियार बन जाए, तो सबसे पहले इंसानियत मरती है।"

कभी एक दौर हुआ करता था जब  मुहब्बत का नाम सुनते ही आँखों में हया उतर आती थी। दिलों में अपनापन जाग उठता था। रिश्तों में यक़ीन की ख़ुशबू महकती थी। इश्क़ का मतलब किसी को हासिल करना नहीं, बल्कि उसकी ख़ुशियों के लिए अपनी ख़्वाहिशों की क़ुर्बानी देना होता था। मुहब्बत एक ऐसी पाकीज़ा कैफ़ियत थी, जिसमें जिस्म नहीं, रूहें एक-दूसरे से हम-कलाम होती थीं। मगर "अफ़सोस" आज उसी मुहब्बत का चेहरा इस क़दर मस्ख़ (बुरी सूरत) हो चुका है कि जब भी किसी अख़बार की सुर्ख़ी में "प्रेम-प्रसंग" लिखा दिखाई देता है, दिल दहल जाता है। क्योंकि अब उसके बाद अक्सर कोई लाश, कोई ख़ून, कोई धोखा, कोई बेवफ़ाई और किसी मासूम का जनाज़ा हमारा इंतज़ार कर रहा होता है।

आज का समाज एक अजीब दौर से गुज़र रहा है। लोग कहते हैं कि मुहब्बत बढ़ रही है, बात थोड़ी तीखी है,मगर हक़ीक़त यही है कि मुहब्बत नहीं, हवस बढ़ रही है। इश्क़ नहीं, ज़िद बढ़ रही है। वफ़ा नहीं, मफ़ादपरस्ती बढ़ रही है। रिश्ते नहीं बन रहे, सौदे हो रहे हैं। लोग एक-दूसरे को चाहते कम हैं, इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं।

"ज़रा सोचिए...

जिस रिश्ते की बुनियाद भरोसे पर रखी जाती है, उसी भरोसे का गला सबसे पहले क्यों घोंटा जा रहा है? 

जिस हाथ में कभी गुलाब होता था, उसी हाथ में आज चाकू क्यों है? जिस ज़ुबान से "मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा"/छोडूॅंगी,कहा जाता है, आज़ वही ज़ुबान अदालत में झूठ बोलती है, पुलिस के सामने बयान बदलती है और सोशल मीडिया पर दूसरे रिश्ते तलाशती है।

हमने मुहब्बत को इतना सस्ता कर दिया है कि अब वह बाज़ार की किसी चीज़ की तरह इस्तेमाल होने लगी है।

आज किसी लड़की ने रिश्ता ठुकरा दिया तो तेज़ाब फेंक दिया जाता है। किसी लड़के ने इंकार कर दिया तो झूठे मुक़दमे दर्ज करा दिए जाते हैं। कहीं प्रेमिका की हत्या, कहीं प्रेमी के टुकड़े, कहीं पत्नी का गला दबा दिया गया, कहीं पति को रास्ते से हटा दिया गया। कहीं प्रेमी के चक्कर में मंगेतर को विशाल चट्टान से धकेल दिया जाता है। और हर बार बहाना एक ही,"मैं उससे बहुत प्यार करती थी, करता था।"

क्या वाकई यह प्यार है?

"हरगिज़ नहीं!

यह प्यार नहीं, यह नफ़्स की ग़ुलामी है।

यह मुहब्बत नहीं, मलकियत का जुनून है।

यह वफ़ा नहीं, ज़ेहनी बीमारी है।

सच तो यह है मुहब्बत कभी क़त्ल नहीं करती। मुहब्बत तो अपने महबूब के आँसू तक बर्दाश्त नहीं कर सकती। जो इंसान किसी की साँसें छीन ले, वह आशिक़ नहीं, "क़ातिल" है। जो भरोसे को तोड़ दे, वह हमसफ़र नहीं, मुजरिम है। जो रिश्ते को धोखे में बदल दे, वह महबूब नहीं, फ़रेबी है।

सबसे ज़्यादा दर्दनाक बात यह है कि इन घटनाओं ने समाज को धीरे-धीरे बेजान बना दिया है। अपंग बना दिया है। अब किसी की हत्या की ख़बर सुनकर लोग बस दो मिनट अफ़सोस करते हैं, फिर अगले वीडियो पर स्क्रॉल कर देते हैं। इंसानियत की मौत पर हमारी संवेदनाएँ भी मर चुकी हैं।

"अफसोस" हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ मोबाइल की बैटरी ख़त्म हो जाए तो बेचैनी होती है, लेकिन किसी माँ की गोद उजड़ जाए, किसी बहन का भाई मार दिया जाए, किसी बच्चे का बाप धोखे से मौत के घाट उतार दिया जाए" तो हम उसे महज़ एक "न्यूज़" समझकर आगे बढ़ जाते हैं।

यही हमारी सबसे बड़ी शिकस्त है। यह सच है, समाज की बर्बादी किसी एक क़ातिल से नहीं होती, बल्कि उन तमाशबीनों से होती है जो हर ज़ुल्म को देखकर भी ख़ामोश रहते हैं।

आज ज़रूरत इस बात की नहीं कि हम सिर्फ़ क़ानून सख़्त करें। ज़रूरत इस बात की है कि हम अपनी औलादों को मुहब्बत का सही मतलब सिखाएँ। उन्हें बताएँ कि इश्क़ किसी को हासिल करने का नाम नहीं होता, बल्कि उसकी इज़्ज़त, उसकी आज़ादी और उसकी ख़ुशी का एहतराम करने का नाम है। अगर सामने वाला आपको नहीं चाहता, तो उसे उसकी राह पर जाने देना भी मुहब्बत है।

भरोसा किसी रिश्ते की जान होता है। जिस दिन भरोसा मरता है, उसी दिन रिश्ता भी दफ़्न हो जाता है। आज समाज में सबसे ज़्यादा क़त्ल अगर किसी चीज़ का हो रहा है, तो वह इंसान नहीं, "भरोसा" है।

"याद रखिए...

जिस समाज में भरोसा मर जाए, वहाँ अदालतें बढ़ जाती हैं, मगर इंसाफ़ की उम्मीदें बहुत कम हो जाती है। वहाँ रिश्ते बढ़ जाते हैं, मगर अपनापन नहीं। वहाँ शादी के मंडप सजते हैं, मगर घर उजड़ जाते हैं। वहाँ लोग मुस्कुराते तो ज़रूर हैं, लेकिन दिलों में तन्हाई का रेगिस्तान एक अलग दुनिया बसा लेता है।

अगर अब भी हम नहीं जागे, तो आने वाली नस्लें, "लैला मजनू,शीरिन फरहाद, राधा, कृष्ण, जैसी, तमाम मुहब्बत की कहानियाँ किताबों में पढ़ेंगी और हक़ीक़त में सिर्फ़ धोखा, ख़ून और बेवफ़ाई देखेंगी।

उस दिन हमारी तहज़ीब का जनाज़ा उठ चुका होगा, और उसके कंधे पर हम सब होंगे। आख़िर में बस इतना कहूंगा,,

"रिश्तों का ख़ून करके जो ख़ुशियाँ तलाशते हैं"

"उन्हें उम्र भर सुकून की मंज़िल नहीं मिलती"।



लेखक- साजिद अली सतरंगी

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