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Monday, July 6, 2026

गर्भ रखना या नहीं, महिला को निर्णय लेने का अधिकार': इंदौर हाईकोर्ट का दंपती के बीच चल रहे विवाद में फैसला; कहा-पति की सहमति जरूरी नहीं

नवीन मौर्य

नित्य संदेश, इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।


कोर्ट ने 13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को गर्भपात की अनुमति दी है। साथ ही स्पष्ट किया है कि कानून द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर गर्भावस्था है तो महिला खुद तय कर सकती है कि वह गर्भ रखना चाहती है या नहीं। उसे गर्भपात के लिए पति की सहमति आवश्यक नहीं है।


29 जून 2026 को कोर्ट ने यह आदेश दिया था। मामला इंदौर संभाग के एक हाई प्रोफाइल दंपती का है। शादी को दो साल हुए थे। इस बीच दोनों में विवाद होने लगे। खास बात यह कि इसी दौरान पत्नी गर्भवती थी। उसे 13 हफ्ते का गर्भ था।


चूंकि दंपती के बीच विवाद ज्यादा होने लगे और पत्नी भी अलग हो गई। ऐसी स्थिति में पत्नी नहीं चाहती थी कि बच्चा जन्म ले क्योंकि मौजूदा विकट स्थिति और उसके भविष्य का सवाल था।


• सहमति के बाद पीछे हट गया पति...

महिला ने अपने एडवोकेट जीपी सिंह के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका लगाई और गर्भपात की अनुमति मांगी गई। कोर्ट को बताया कि पति के साथ वैवाहिक संबंध समाप्त करने का निर्णय हो चुका था, लेकिन बाद में पति अपने रुख से पीछे हट गया। ऐसे में गर्भावस्था जारी रखना उसके लिए मानसिक तनाव, असुरक्षा और भावनात्मक पीड़ा का कारण बन रहा है।


• पति को नोटिस, फिर भी नहीं हुआ पेश...

मामले में पति को नोटिस जारी किया गया था और उसकी तामील भी हो चुकी थी, लेकिन वह सुनवाई के दौरान कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ। राज्य शासन की ओर से भी याचिका पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई।


• कोर्ट ने माना प्रजनन स्वतंत्रता मौलिक अधिकार...

मामले में कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले 'एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर' का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत महिला को अपनी शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है।


• जानिए क्या और क्यों दी गर्भपात की अनुमति...

कोर्ट ने कहा कि अवांछित गर्भावस्था का मानसिक और शारीरिक प्रभाव सबसे अधिक महिला पर पड़ता है, इसलिए गर्भ जारी रखना है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय महिला का ही होगा।


कोर्ट ने कहा कि महिला की गर्भावस्था 13 सप्ताह और एक दिन की है, जो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (MTP) एक्ट, 1971 की निर्धारित सीमा के भीतर है। ऐसे मामलों में अधिकृत डॉक्टर्स कानून के अनुसार गर्भ समापन की प्रक्रिया कर सकते हैं।


कोर्ट ने यह भी माना कि वैवाहिक स्थिति में बदलाव, पति-पत्नी का अलग रहना और तलाक की स्थिति भी गर्भपात की अनुमति के लिए वैध आधार हो सकते हैं।


आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। महिला की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार हैं।


कोर्ट ने डॉक्टर्स को निर्देश दिया कि गर्भपात की प्रक्रिया स्वास्थ्य मंत्रालय और कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप पूरी सावधानी और संवेदनशीलता के साथ की जाएं। याचिका स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने महिला को गर्भपात की अनुमति प्रदान कर दी और मामले का निराकरण कर दिया।


"एक पति-पत्नी के बीच तलाक का विवाद चल रहा था। बाद में प्रेग्नेंसी का मामला सामने आ गया। ऐसे में जजमेंट में देखा गया कि आगे चलकर माता-पिता अलग हो जाएंगे, और जो बच्चा जन्म लेगा, उसके भविष्य का क्या होगा?" 

—जीपी सिंह, एडवोकेट

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