नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी की प्रेरणा से शास्त्रीनगर में निजनिवास पर सामवेद की अष्टमकथा के पाँचवें दिन सामवेद के पञ्चम एवं षष्ठ प्रपाठक की कथा के अन्तर्गत पवमान सोम, इन्द्र, अग्नि और सूर्य देवताओं से सम्बन्धित मन्त्रों की कथा कही।
आज की कथा का प्रारम्भ आप्री सूक्त के मन्त्रों से हुआ। डॉ. पूनम ने आप्री सूक्त के विषय में बताया कि ऋषियों द्वारा संकलित विशेष आह्वान और स्तुति मन्त्र जो विभिन्न देवताओं को प्रसन्न और सन्तुष्ट करें उनका समूह आप्री सूक्त है। ऋग्वेद में 10 आप्री सूक्त हैं ।सामवेद के छठे प्रपाठक के प्रथमार्ध के प्रारम्भिक तीन मन्त्र आप्री सूक्त के हैं जिसके ऋषि मेधातिथि कण्व हैं। आप्री सूक्त के 11 प्रमुख देवता हैं - समिद्ध अग्नि, तनूनपात्, नराशंस, इला, बर्हि, देवीद्वार, उषासानक्ता, होतार, तिस्रो देवी (सरस्वती, भारती, इला) , त्वष्टा, वनस्पति और स्वाहा।
ऋषिगण प्रार्थना करते हैं कि हम यज्ञ में प्रिय और आह्लादक अग्निदेव का आह्वान करते हैं,वे हमारी हवियों को देवताओं तक पहुँचाते हैं। इन्द्र की स्तुति करते हुए ऋषिजन कहते हैं कि हे इन्द्र आप प्रजाओं के राजा हैं। आपके समान कोई सामर्थ्यवान् नहीं है। रसयुक्त पदार्थों और निकाले गए रसों के स्वामी हैं। ऋषि याजकों से कहते हैं कि इन्द्रदेव की ही स्तुति करो, वही समस्त ऐश्वर्य को प्रदान करने वाले हैं। कण्व, भृगु आदि ऋषियों ने इन्द्र देव का साक्षात्कार कर उनकी महत्ता का गान किया। डॉ. पूनम ने अमरत्व का लौकिक और व्यावहारिक स्वरूप स्पष्ट किया।
सूर्य आत्मा का प्रतीक है। सूर्य आकाश और पृथ्वी के मध्य उदय से अस्त तक व्याप्त रहता है। वह आकाश को प्रकाश युक्त और तेजोमय बनाता है। सूर्य के समा अपने आत्मतत्त्व को भी तेज और ओज से सम्पन्न बनाना चाहिये।

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