सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में "डॉ. बशीर बद्र की याद में श्रद्धांजलि सभा" विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। निःसंदेह बशीर बद्र साहब एक विशिष्ट शैली के शायर थे। उनकी भाषा, लहजा, बात कहने का अंदाज़ और उनके रूपक उन्हें सबसे अलग बनाते हैं। इस विशिष्टता का एहसास उन्हें स्वयं भी था और उन्होंने अपने अनेक शेरों में इसका उल्लेख किया है। एक समय ऐसा था जब भारत के हर बड़े मुशायरे में उनकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी। बशीर बद्र वास्तव में अद्वितीय थे। उनके अनेक शेर ऐसे हैं जो अन्य शायरों से बिल्कुल भिन्न और अलग पहचान रखते हैं। ये विचार प्रसिद्ध शायर प्रोफेसर शहपर रसूल ने उर्दू विभाग और आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित "डॉ. बशीर बद्र की याद में श्रद्धांजलि सभा" विषयक कार्यक्रम में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि बशीर बद्र की जो विशिष्टता थी, वह उनके साथ ही चली गई। मैं ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करता हूँ।
कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने की। इस अवसर पर प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी, प्रोफेसर शहपर रसूल, प्रोफेसर रेशमा परवीन, प्रोफेसर सिराज अजमली, राहत बद्र, शबनम शमशाद, डॉ. मुईन शादाब, रज़िया हमीद, डॉ. ज़की तारिक, डॉ. रामगोपाल भारतीय, इरफान आज़मी, आफ़ाक़ अहमद ख़ान, डॉ. आसिफ अली, डॉ. जितेंद्र परवाज़, डॉ. इरशाद सियानवी, इरफान आरिफ और मोहम्मद शमशाद सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन उर्दू विभाग की शोध छात्रा सैयदा मरियम इलाही ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन मोहम्मद आबिद ने प्रस्तुत किया। अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. आसिफ अली ने कहा कि बशीर बद्र ने मीर और ग़ालिब की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने ग़ज़ल की उन शास्त्रीय परंपराओं को, जो आधुनिकता और नए प्रयोगों के नाम पर समाप्त होती जा रही थीं, न केवल जीवित रखा बल्कि अपने शिष्यों के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाया। उनका निधन उर्दू साहित्य, विशेषकर उर्दू ग़ज़ल के लिए अपूरणीय क्षति है।
कश्मीर से शबनम शमशाद ने कहा कि बशीर बद्र ने आधुनिक ग़ज़ल को नई भाषा, नया लहजा और नई शैली प्रदान की। वे अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति थे। बचपन से अनेक कठिनाइयों और दुखों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। मेरठ कॉलेज भी सौभाग्यशाली रहा कि उसे बशीर बद्र जैसा शिक्षक मिला। उन्होंने उर्दू शायरी को नया अंदाज़ और विशिष्ट अभिव्यक्ति दी। उन्होंने अपने दुखों और अनुभवों को भी शायरी का रूप प्रदान किया। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। प्रोफेसर सिराज अजमली ने कहा कि 1980 के दशक में जहाँ भी मुशायरा होता था, वहां बशीर बद्र स्वयं को सबसे सम्मानित और विशिष्ट शायर के रूप में स्थापित कर चुके थे। छात्र जीवन में ही आधुनिक कविता से संबंधित उनके कुछ शेर पाठ्यक्रम में शामिल थे। उनकी शायरी आधुनिक युग का उत्कृष्ट प्रतिनिधित्व करती है।
आफ़ाक़ अहमद ख़ान ने कहा कि बशीर बद्र किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उर्दू जगत उन पर गर्व कर सकता है। वे संकेतों में ही बड़ी महत्वपूर्ण बातें कह जाया करते थे। उनकी एक विशेषता यह भी थी कि वे अपने शेरों को केवल तरन्नुम में ही नहीं बल्कि साधारण पाठ के रूप में भी प्रस्तुत करते थे और साथ-साथ उनके पीछे की पृष्ठभूमि भी बताते चलते थे। वे किसी साहित्यिक गुटबंदी का हिस्सा नहीं थे। मैं उन्हें हृदय की गहराइयों से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और आशा करता हूँ कि आने वाली पीढ़ियाँ उनके काव्य-संसार से लाभान्वित होती रहेंगी।
डॉ. मुईन शादाब ने कहा कि मैं उर्दू विभाग और आयुसा टीम का आभारी हूँ जिन्होंने मुझे बोलने का अवसर दिया। बशीर बद्र की ग़ज़लगोई को बड़ी-बड़ी हस्तियों ने स्वीकार किया है। वे शब्दों की संस्कृति के कवि थे और शब्दों के प्रयोग की अद्भुत कला जानते थे। उन्होंने अपनी शायरी में जीवन के अनुभवों, घटनाओं और अवलोकनों को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। वे दूरदर्शी शायर थे और ग़ज़ल के क्षेत्र में सदैव याद किए जाएंगे।
डॉ. ज़की तारिक ने अपनी पुरानी यादें साझा करते हुए कहा कि बशीर बद्र से मेरा गहरा संबंध रहा है और मेरठ के एक मुशायरे में सबसे पहले मैंने ही उन्हें आमंत्रित किया था। उन्होंने मात्र सात वर्ष की आयु से शेर कहना शुरू कर दिया था। ग्यारह वर्ष की आयु में इटावा के एक मुशायरे में ग़ज़ल पढ़ी, जहाँ एक बुज़ुर्ग ने उन्हें "बद्र" तख़ल्लुस दिया। वे योजनाबद्ध सोच वाले व्यक्ति थे और अपनी शायरी भी योजनाबद्ध ढंग से करते थे। उनमें अद्भुत आत्मविश्वास था। वे मेरे अत्यंत अच्छे शिक्षक थे।
इरफान आज़मी ने कहा कि बशीर बद्र केवल अच्छे शायर ही नहीं, बल्कि बहुत अच्छे इंसान भी थे। वे हमेशा अपने छात्रों और साथियों का उत्साहवर्धन करते थे। मैं उनका बहुत सम्मान करता था और आज भी करता हूँ। उन्होंने हम जैसे अनेक शायरों को दिशा दी और उन्हें संवारा। वे अत्यंत उदार हृदय व्यक्ति थे। उनके काव्य में भावनाओं और संवेदनाओं की गहराई है। उनके लहजे में करुणा के साथ-साथ एक हल्की सी पीड़ा भी दिखाई देती है। उन्होंने जीवन के अनुभवों और घटनाओं को उपमा एवं रूपकों के माध्यम से काव्यात्मक रूप प्रदान किया।
डॉ. रामगोपाल भारतीय ने कहा कि बशीर बद्र ने केवल उर्दू भाषियों को ही नहीं, बल्कि हिंदी भाषियों को भी नई दिशा दिखाई। वे गंगा-जमुनी तहज़ीब के सच्चे प्रतिनिधि थे। हमने हिंदी जगत में उनकी शायरी से बहुत कुछ सीखा है। मैं हिंदी संगठनों की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
प्रोफेसर फारूक बख्शी ने कहा कि बशीर बद्र से मेरा दैनिक संपर्क रहा है। उनकी स्नेहपूर्ण छाया में मेरी शायरी भी विकसित हुई। बशीर बद्र की शायरी वास्तव में इक्कीसवीं सदी की शायरी है। उन्होंने अपनी व्यक्तित्व और रचनात्मकता से विश्वभर में पहचान बनाई। उनकी शायरी में लगभग पचास ऐसे शेर मिल जाएंगे जिनके विषय उनसे पहले कभी नहीं अपनाए गए थे। वे नई भाषा, नई संवेदना और नया रोमानी दृष्टिकोण लेकर आए थे। मेरठ में उनके चाहने वालों का एक बड़ा समूह बन चुका था और मेरठ ने उन्हें पूरी तरह अपना लिया था।
इस अवसर पर उनकी जीवनसंगिनी राहत बद्र ने कहा कि मैं आप सभी की आभारी हूँ कि आपने इस श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया। साहित्य और कविता में उनके योगदान से तो सभी परिचित हैं, लेकिन वे एक आदर्श पति भी थे। मैं प्रार्थना करती हूँ कि हर लड़की को ऐसा उदार और उच्च चरित्र वाला जीवनसाथी मिले। उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया और मैंने भी उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी। आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।
प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि आज का कार्यक्रम अत्यंत सफल रहा क्योंकि इसमें शामिल सभी लोग दिल से जुड़े थे—बशीर बद्र के साथी, शिष्य, परिवारजन और उनके प्रशंसक। हम सभी भाषा और साहित्य के रिश्ते से जुड़े हुए हैं। निस्संदेह बशीर बद्र शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हम उनकी शायरी को हमेशा गुनगुनाते रहेंगे, क्योंकि कलाकार कभी मर नहीं सकता। इस अवसर पर इरफान आरिफ और डॉ. जितेंद्र परवाज़ ने भी बशीर बद्र के साथ बिताए दिनों की स्मृतियाँ साझा कीं।
अंत में, अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने कहा कि साहित्यिक रुचि रखने वाले हर व्यक्ति ने बशीर बद्र को अपना लिया था, चाहे वह अलीगढ़ हो, मेरठ हो या भोपाल। आज की श्रद्धांजलि सभा उनके व्यक्तित्व के अनुरूप रही। उनकी पत्नी ने जो बातें साझा कीं, उनसे बशीर बद्र की उदारता और उच्च चरित्र का परिचय मिलता है। उनकी व्यावहारिक जीवन-शैली भी उतनी ही उत्कृष्ट थी जितनी उनकी कला। ईश्वर उन्हें उच्च स्थान प्रदान करे। कार्यक्रम से बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ भी जुड़े रहे।

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