क्यों अजनबी हैं हम
ये उदासी और थकान,
मानव दिलों के टूटते अरमान।
चकाचौंध में डूबा यह शहर,
अपने ही बसेरे में,
सब हो गए अनजान।
ये कैसी उड़ान,
टूटती मासूमियत,
भटकता बदहवास नौजवान,
खामोश, बेजान रिश्तों में -
कैसा इंसान!
मिशनपरस्ती और रोजगार,
आधुनिकता की डिमांड,
उपभोक्ता की धड़कन -
ये है पश्चिमी विचार।
अपने ही शहर में नहीं है
अपनी पहचान,
हर शख्स में न जाने क्यों
भर गया है अभिमान।
क्यों हो गए पराए
अपने ही चमन में?
क्यों अजनबी हैं,
हम अपने ही शहर में?
वर्षों से मेरे पड़ोस में,
एक आदमी रहता है
कौन है? यह मुझे
अब तक नहीं पता।
नज़रें मिलती हैं,
हैलो तो हुई है,
पर अजनबीपन
वैसा ही बना है।
क्यों खो गए हम
हम अपनी ही डगर में?
क्यों अजनबी हैं हम
अपने ही शहर में?
—डाॅ. निखिल पांडे
नई दिल्ली
(लेखक शिक्षाविद् हैं।)


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