नवीन मौर्य
नित्य संदेश, इंदौर। सानंद न्यास के पांच दर्शक समूह के लिए सस्पेंस थ्रिलर नाटक ''पुढच्या शुक्रवार 7 वाजता'' का मंचन शनिवार शाम से प्रारंभ हुआ। मराठी रंगमंच हमेशा से नए विचारों और सशक्त अभिनय के लिए जाना जाता रहा है। इसी परंपरा को आगे बढ़ते हुए संबंधों की अवधारणाओं, भावनात्मक संघर्ष और जीवन में आशा की नई किरण को दर्शन देने वाला नया मराठी नाटक है 'पुढच्या शुक्रवार 7 वाजता''। दरअसल,
समकालीन मराठी रंगमंच पर इन दिनों नाटकों के शीर्षक ही दर्शकों की उत्सुकता का केंद्र बन जाते हैं। कुछ शीर्षक कथानक की झलक दे देते हैं, जबकि कुछ अपनी रहस्यमयता से आकर्षित करते हैं। ‘अगले शुक्रवार शाम 7 बजे’ (पुढच्या शुक्रवारी ७ वाजता) ऐसा ही एक शीर्षक है, जो पहली दृष्टि में सामान्य प्रतीत होता है, किंतु नाटक आगे बढ़ने के साथ इसका वास्तविक अर्थ और प्रतीकात्मकता उद्घाटित होती जाती है। लेखक सुदीप मोडक ने इस शीर्षक को केवल एक समय-सूचक वाक्य न रहने देकर उसे मानवीय संबंधों, उम्मीदों और आत्ममंथन का रूपक बना दिया है।
चौरंग एंटरटेनमेंट द्वारा निर्मित यह नाटक पारंपरिक व्यावसायिक रंगमंच की स्थापित लीक से हटकर मानसिक स्वास्थ्य, मानवीय रिश्तों, अकेलेपन और भावनात्मक संघर्ष जैसे विषयों को केंद्र में रखता है। यही कारण है कि यह प्रस्तुति एक विशिष्ट ‘ऑफ-बीट’ रंगकृति के रूप में सामने आती है।
कहानी...
नाटक की कथा तीन प्रमुख पात्रों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। राधिका एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत महत्वाकांक्षी महिला है। मंगेश धारावी में रहने वाला एक मेधावी युवक है, जो नशे की गिरफ्त में फंस चुका है। वहीं डॉ. अतुल एक मनोचिकित्सक हैं, जो अपने पेशे और जीवन दोनों से लगभग निराश हो चुके हैं। परिस्थितियां इन तीनों को एक बिंदु पर लाकर खड़ा करती हैं और यहीं से शुरू होती है आत्मसंघर्ष, रिश्तों और जीवन के अर्थ की खोज।
लेखक सुदीप मोडक ने कथा को अत्यंत संवेदनशीलता और भावनात्मक गहराई के साथ विकसित किया है। नाटक का प्रत्येक पात्र अपने भीतर किसी न किसी प्रकार के अभाव, पीड़ा या रिक्तता को ढो रहा है। कोई करियर की दौड़ में स्वयं को खो चुका है, कोई संबंधों के बोझ तले दबा है, तो कोई अपने ही अस्तित्व से कट गया है। इन्हीं मनःस्थितियों के बीच संवाद, स्वीकार्यता और आशा की संभावनाएं उभरती हैं।
विशेष उल्लेखनीय यह है कि मानसिक स्वास्थ्य जैसे गंभीर विषय को लेखक ने कहीं भी बोझिल या उपदेशात्मक नहीं बनने दिया। संवाद सहज हैं, किंतु उनमें जीवन की जटिलताओं पर गंभीर चिंतन निहित है। नाटक दर्शक को केवल कहानी नहीं सुनाता, बल्कि उसे अपने भीतर झांकने के लिए विवश करता है।
निर्देशक नीरज शिरवईकर ने इस संवेदनशील विषयवस्तु को अत्यंत परिपक्वता और संतुलन के साथ मंच पर उतारा है। प्रत्येक दृश्य में भावनात्मक तीव्रता और नाटकीय संयम का सुंदर संतुलन दिखाई देता है। गंभीर विषय के बावजूद प्रस्तुति कहीं भी धीमी या बोझिल नहीं होती। पात्रों की आंतरिक दुनिया को मंचीय भाषा में व्यक्त करने की उनकी क्षमता सराहनीय है।
अभिनय की दृष्टि से सतीश राजवाडे का डॉ. अतुल विशेष रूप से प्रभावित करता है। उनका संयत, सहज और अंतर्मुखी अभिनय चरित्र को विश्वसनीयता प्रदान करता है। संवादों की मितव्ययी प्रस्तुति, देहभाषा और सूक्ष्म अभिव्यक्तियां उनके अभिनय को प्रभावशाली बनाती हैं।
मंगेश की भूमिका में स्वयं लेखक सुदीप मोडक ने एक ऐसे युवा की मनोदशा को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया है, जो नशे और भावनात्मक विघटन के बीच झूल रहा है। वहीं चैत्राली गुप्ते की राधिका रहस्य, महत्वाकांक्षा और संवेदनशीलता का संतुलित मिश्रण बनकर उभरती है। उनके बदलते भाव और आंतरिक द्वंद्व चरित्र को बहुआयामी बनाते हैं।
तकनीकी पक्ष भी नाटक की बड़ी शक्ति है। संदेश बेंद्रे द्वारा निर्मित मंच-सज्जा यथार्थ और कलात्मकता का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है। डॉ. अतुल का क्लिनिक और धारावी का परिवेश अत्यंत विश्वसनीय प्रतीत होता है। शीतल तळपदे की प्रकाश-योजना प्रत्येक दृश्य की भावभूमि को सशक्त बनाती है, जबकि राहुल रानडे का संगीत नाटक की संवेदनात्मक परतों को और गहरा करता है। नेपथ्य, प्रकाश और संगीत का यह त्रिवेणी-संगम प्रस्तुति को विशेष ऊंचाई प्रदान करता है।
कुल मिलाकर ‘अगले शुक्रवार शाम 7 बजे’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि मानवीय मन की जटिलताओं और रिश्तों की नाजुक संरचना का गंभीर अध्ययन है। यह प्रस्तुति दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या जीवन की टूटनों को वास्तव में सुधारा जा सकता है, या हमें उनके साथ जीना सीखना पड़ता है।
व्यावसायिक रंगमंच पर ऐसे विषय विरले ही देखने को मिलते हैं। इसलिए जो दर्शक मनोरंजन के साथ-साथ विचार और संवेदना की तलाश में हैं, उनके लिए यह नाटक एक अनिवार्य रंगानुभव है। नाटक समाप्त होने के बाद भी इसके पात्र, संवाद और प्रश्न लंबे समय तक स्मृति में बने रहते हैं। यही किसी उत्कृष्ट रंगकृति की सबसे बड़ी पहचान है।
कलाकार ...
चैत्राली गुप्ते, सुदीप मोडक, अभिजीत दाळी, सतीश राजवाडे
क्रू टीम....
लेखक - सुदीप मोडक,
दिग्दर्शक - नीरज शिरवाइकर,
नेपथ्य -संदेश बेंद्रे,
संगीत - राहूल रानडे,
प्रकाशयोजना - शीतल तळपदे,
वेशभूषा - शाल्मली तोळये,
सूत्रधार नितीन नाईक, दीपक जोशी,
रविवार को तीन शो
सानंद न्यास के अध्यक्ष जयंत भिसे और मानद सचिव संजय वावीकर ने बताया कि नाटक ''पुढच्या शुक्रवार 7 वाजता'' का मंचन 14 जून रविवार को मामा मुजूमदार के लिए प्रातः 10 बजे, वसंत समूह के लिए अपराह्न 4 बजे एवं सायं 7.30 बजे बाहर समूह के लिए होगा।



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