नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी जी की प्रेरणा से शास्त्रीनगर में निजनिवास पर सामवेद की अष्टमकथा के छठे दिन सामवेद के पञ्चम एवं षष्ठ प्रपाठक की कथा के अन्तर्गत पवमान सोम, इन्द्र और अग्नि से सम्बन्धित मन्त्रों की कथा कही।
ऋषि अग्नि की उपासना करते हुए कहते हैं कि सदैव ज्वाल्यमान् अग्नि परस्पर स्नेह सौजन्ययुक्त प्रजाओं के एकत्र होने पर हविदाताओं के ऐश्वर्य की रक्षा करते हैं। संसार का भरण पोषण करने वाले हे अग्नि! आप प्रज्वलित होकर उन्नत हों। आप अपने अक्षुण्ण तेज से प्रकाशित होकर जगत् को प्रकाशित करें। एक मन्त्र को उद्धृत कर डा. पूनम ने स्पष्ट किया कि इस मन्त्र में पुनर्जन्म का रहस्य छुपा है कि जीव की कौन माता होगी और कौन पिता होगा, उसका जन्म कहाँ होगा।
हे इन्द्र ! आप अजातशत्रु, सर्वनियन्ता हैं। आप बंधुत्व की इच्छा से युद्ध में शत्रुओं का विनाश करके साधकों को अपना बन्धु मानते हैं। संकेत मात्र से गति पकड़ने वाले अश्व आपको स्वर्ण रथ में बैठा कर यज्ञस्थल पर सोमपान करने के लिए लेकर आएं। आप सर्वप्रथम सोम रस का पान करें। हे इन्द्र! हम शुद्ध स्तुतियों से आपका स्तवन कर रहे हैं।आप स्वयं शुद्ध हैं, आप हमें शुद्ध ऐश्वर्य प्रदान करें। यहाँ हर प्रकार के शौच का उपदेश दिया गया है। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि जिस प्रकार पुत्र पिता से धन माँगता है, उसी प्रकार हम आपसे ऐश्वर्य की प्रार्थना करते हैं।
हे सोम! आप परम पराक्रमी, जेता, धनप्रदाता, पवित्र, प्रेरक, युद्ध में शत्रुओं को हराने वाले हैं। आप हमें उत्तम वस्त्र, तेजस्वी स्वर्ण आदि ऐश्वर्य प्रदान करें।आप नव प्रसूता दुधारू गायें प्रदान करें।आज की कथा में पुनर्जन्म के रहस्यों को स्पष्ट किया गया।

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