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Sunday, May 3, 2026

कोटा में बढ़ती छात्र आत्महत्याएँ: संरचनात्मक दबाव, अभिभावकीय अपेक्षाएँ और कोचिंग अर्थव्यवस्था



प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान
नित्य संदेश। कोटा, जिसे भारत की “कोचिंग राजधानी” के रूप में जाना जाता है, एक अत्यंत चिंताजनक प्रवृत्ति का केंद्र बन गया है—छात्र आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाएँ। इन मामलों का एक बड़ा हिस्सा उन विद्यार्थियों से संबंधित है जो **NEET** और **JEE** जैसी अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे होते हैं। यह स्थिति केवल शैक्षणिक दबाव को नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दबावों को भी दर्शाती है।

*समस्या का स्वरूप*
कोटा आने वाले अधिकांश छात्र किशोरावस्था में होते हैं और जीवन के एक महत्वपूर्ण विकासात्मक चरण से गुजर रहे होते हैं। उन्हें निम्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:

* तीव्र शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा
* लंबे समय तक अध्ययन
* परिवार से दूर सामाजिक अलगाव
* निरंतर प्रदर्शन का मूल्यांकन

इन परिस्थितियों में, विशेषकर तब जब अपेक्षाएँ उनकी रुचियों या क्षमताओं से मेल नहीं खातीं, यह वातावरण अत्यधिक दबावपूर्ण हो जाता है।

*अभिभावकीय दबाव और आकांक्षात्मक बोझ*

एक प्रमुख कारण अभिभावकों द्वारा डाला जाने वाला दबाव है। अनेक मामलों में:

* करियर विकल्प थोपे जाते हैं, न कि मिलकर तय किए जाते हैं
* चिकित्सा और इंजीनियरिंग को “डिफ़ॉल्ट” विकल्प माना जाता है
* साथियों से तुलना (“दूसरे सफल हुए, तो तुम्हें भी होना चाहिए”) तनाव बढ़ाती है

अभिभावकों की महत्वाकांक्षा और बच्चे की रुचि के बीच यह असंतुलन आंतरिक संघर्ष उत्पन्न करता है। जब छात्र स्वयं चुने बिना किसी मार्ग में बंधा महसूस करते हैं, तो उनकी मानसिक सहनशक्ति कम हो जाती है।

 *कोचिंग संस्कृति*

कोटा की कोचिंग व्यवस्था अत्यधिक संरचित और प्रदर्शन-केंद्रित है:

* बड़े बैच और मानकीकृत शिक्षण पद्धति
* बार-बार परीक्षाएँ और रैंकिंग प्रणाली
* व्यक्तिगत ध्यान का अभाव

जो छात्र इस गति के साथ नहीं चल पाते, उनमें हीन भावना विकसित होती है। साथियों से तुलना चिंता को और बढ़ाती है, जिससे आत्म-संदेह और अलगाव का चक्र शुरू हो जाता है।

 *“डमी स्कूल” प्रणाली*

एक अन्य गंभीर समस्या “डमी एडमिशन” की प्रथा है, जिसमें:

* छात्र केवल कागज़ों पर स्कूल में नामांकित रहते हैं
* उपस्थिति और आंतरिक मूल्यांकन औपचारिक रूप से प्रबंधित किए जाते हैं
* अधिकांश समय कोचिंग संस्थानों में व्यतीत होता है

यह व्यवस्था औपचारिक शिक्षा की भूमिका को कमजोर करती है और छात्रों को संतुलित शैक्षणिक अनुभव से वंचित करती है, जिसमें सामाजिक सहभागिता, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ और भावनात्मक विकास शामिल हैं।

चिकित्सा प्रवेश में असमानता

एक अन्य पहलू असमानता की धारणा—और कई बार वास्तविकता—है:

* आर्थिक रूप से सक्षम छात्र निजी संस्थानों के माध्यम से प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं
* कुछ मार्गों में आर्थिक क्षमता योग्यता पर भारी पड़ती है

इससे योग्य लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों में निराशा उत्पन्न होती है, जिन्हें व्यवस्था अन्यायपूर्ण प्रतीत होती है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव

इन सभी कारकों का सम्मिलित प्रभाव निम्न रूप में सामने आता है:

* दीर्घकालिक तनाव और चिंता
* असफलता का भय और आत्म-सम्मान में कमी
* सामाजिक अलगाव
* अवसाद

पर्याप्त मनोवैज्ञानिक सहयोग के अभाव में ये स्थितियाँ आत्मघाती विचारों में परिवर्तित हो सकती हैं।

सुधार की आवश्यकता

इस संकट का समाधान बहुआयामी दृष्टिकोण से ही संभव है:
 1. **अभिभावक जागरूकता**

* बच्चों की रुचि और क्षमता को समझें
* करियर विकल्प थोपने से बचें
* शर्तों के बजाय भावनात्मक समर्थन दें

2. **शैक्षणिक प्रणाली में सुधार**

* डमी स्कूल प्रथा पर सख्त नियंत्रण या समाप्ति
* नियमित स्कूलिंग और अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करना
* विद्यालय स्तर पर करियर परामर्श की व्यवस्था

 3. **कोचिंग उद्योग का नियमन**

* छात्र कल्याण मानकों का निर्धारण
* बैच आकार सीमित करना और मार्गदर्शन सुनिश्चित करना
* संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ अनिवार्य करना

 4. **मानसिक स्वास्थ्य सहयोग**

* सुलभ काउंसलिंग सेवाएँ
* तनाव के संकेतों की प्रारंभिक पहचान
* मनोवैज्ञानिक सहायता लेने के प्रति कलंक को समाप्त करना

 5. **पारदर्शी और योग्यता-आधारित प्रवेश**

* सार्वजनिक चिकित्सा शिक्षा ढाँचे को सुदृढ़ करना
* प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना
* निजी संस्थानों पर अत्यधिक निर्भरता कम करना

सफलता की परिभाषा का विस्तार

समाज की सोच में परिवर्तन आवश्यक है:

* सफलता केवल चिकित्सा या इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं है
* विभिन्न करियर विकल्प सम्मानजनक और सार्थक अवसर प्रदान करते हैं
* छात्रों को उनकी वास्तविक रुचियों के अनुसार आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना बेहतर परिणाम और मानसिक संतुलन सुनिश्चित करता है

निष्कर्ष

कोटा में बढ़ती छात्र आत्महत्याएँ एक अलग-थलग समस्या नहीं हैं, बल्कि यह पारिवारिक अपेक्षाओं, शैक्षणिक व्यवस्थाओं और सामाजिक मूल्यों के असंतुलन का परिणाम हैं। अभिभावकों, शिक्षकों, नीति-निर्माताओं और कोचिंग उद्योग के समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।

छात्रों को मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए, न कि दबाव में धकेला जाना चाहिए; उन्हें समर्थन मिलना चाहिए, न कि केवल अपेक्षाओं का बोझ। तभी हम ऐसा वातावरण बना सकते हैं जहाँ युवा अपनी मानसिक गरिमा को बनाए रखते हुए शैक्षणिक रूप से प्रगति कर सकें।

लेखक
साइक्लोमेड फिट इंडिया के संस्थापक है

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