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Wednesday, May 13, 2026

उनवान-ए-ग़ज़ल

नित्य संदेश

उनवान-ए-ग़ज़ल  (नए अशआर के साथ) 

ग़ज़ल का तुम मिरी उनवान बनते जा रहे हो .

मिरी हर साँस का अरमान बनते जा रहे हो ..


लिखूँगा अब मैं अपनी दास्ताँ जिस के सहारे .

कलम की ज़ोर का सुब्हान बनते जा रहे हो ..


मिरी तन्हाइयों को गुफ़्तगू का फ़न मिला है .

ख़यालों का हसीं दीवान बनते जा रहे हो ..


कभी जो राज़ था अब वो इबादत बन गया है .

मिरी आँखों का तुम ईमान बनते जा रहे हो ..


मिरी ख़ामोशियाँ भी अब तुम्हारी मुंतज़िर हैं .

मिरी हर बात का इमकान बनते जा रहे हो ..


मिरे अंदर की वीरानी ज़रा देखो तो आकर .

कहाँ तुम इस क़दर अंजान बनते जा रहे हो ..


लिखूँ क्या और मैं 'वासिफ़' तुम्हारी मदह-ख्वानी .

मिरी सोचों का तुम अरमान बनते जा रहे हो ..



© डॉ. वासिफ़ काज़ी, इंदौर 

 शाइर एवं व्याख्याता

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