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Thursday, May 21, 2026

चाय: रिश्तों का सरताज... डॉ शबनम सुल्ताना की कविता


नित्य संदेश

चाय: रिश्तों का सरताज

अदरक को थोड़ा कूट कर

इलायची को थोड़ा पीसकर

थोड़ा थोड़ा दूध हो

थोड़ा थोड़ा पानी

चाय पत्तियों के साथ उबालकर

लुभावनी खुशबू के साथ

चीनी घोली ऐसे शीरी लफ्ज़ जैसे

ठंड में गर्मी का एहसास

गर्मी में हो जैसे दिल के लिए वो खास

बरसात की खनक अधूरी इस बिन

चाय सबकी सरताज

रुह को सुकू देती मसालों के इसकी खुशबू

छानी ऐसे जैसे रिश्तों से छानी बुराई

तब अपनों के साथ बैठकर प्यार की चाय खूब पिलाई।

​​"वैसे एक बात है। अब चाय सिर्फ चाय नहीं हमारे देश की परम्परा बन गई है। जैसे हर रिश्ते और हर धर्म से जुड़ गयी"




​— डॉ शबनम सुल्ताना

लेखिका फिजियोथैरेपिस्ट हैं

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