नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के विधि अध्ययन संस्थान में क्षेत्रीय अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार न्यायालयों के समक्ष रणनीतिक मानवाधिकार कानूनी विवाद पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस व्याख्यान के मुख्य वक्ता प्रोफेसर प्रिसिला कैनेपारो वाशिंगटन एण्ड लिकंन यूनिवर्सिटी, यूएसए रही।
कार्यक्रम के विधिवत शुभारम्भ करते हुये डा0 विवेक कुमार समन्वयक विधि अध्ययन संस्थान द्वारा वक्ता का परिचय कराया गया। उन्होने वक्ता का संक्षिप्त परिचय देते हुये बताया कि प्रोफेसर प्रिसिला कैनेपारो एक विश्वविख्यात विधिवेता है। जिन्होने PUC-SP से अंतर्राष्ट्रीय कानून में पीएचडी और इंटरनेशनल सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स रिसर्च (मेडितेरैनिया) से कानून में पोस्ट-डॉक्टरल डिग्री है, और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कानून पर कई पुस्तकें भी लिखी हैं। उनकी व्यापक शैक्षणिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि में यूनिवर्सिटी कतोलिका दे ब्राजील, यूनिवर्सिटी वाशिंगटन एंड लिकंन, फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ पराना (UFPR), FAE बिजनेस स्कूल, ब्राजीलियाई अंतर्राष्ट्रीय कानून अकादमी, अंतर्राष्ट्रीय कानून आयोग, OAB/PR, RED डे डेरेचो अमेरिका लातीना वाई कैरिबे, इबेरोअमेरिकन एसोसिएशन ऑफ लॉ, कल्चर & एनवायरनमेंट में भूमिकाएं शामिल हैं, साथ ही उन्होंने मुख्य रूप से विश्व व्यापार संगठन ¼WTO½ और संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक और सामाजिक परिषद (UN ECOSOC) में नागरिक कूटनीति प्रतिनिधि (Civil Diplomacy Delegate) के रूप में भी कार्य किया है।
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों के समक्ष मानवाधिकार कानूनी विवाद का एक नवीन प्रकरण है, जो द्वितीय विश्व युद्ध (WWII) के बाद अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण प्रणालियों के विकास से उभरी है। इसके तहत क्षेत्रीय न्यायालयों ने घरेलू क्षेत्राधिकार से परे मानवाधिकार के उल्लंघनों पर मुक़दमेबाजी के नए मानक स्थापित किए। इस विकास क्रम की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के ढांचे के माध्यम से एक वैश्विक (सार्वभौमिक) प्रणाली की स्थापना के साथ हुई। इसके बाद 1950 के दशक में पहले क्षेत्रीय मॉडल के रूप में यूरोपीय प्रणाली का गठन हुआ, 1960 और 1970 के दशक में क्षेत्रीय चुनौतियों के बीच इंटर-अमेरिकन प्रणाली का विकास हुआ, और अंततः 1980 के दशक के बाद से अफ्रीकी प्रणाली का उदय हुआ, जिसने वहां की स्थानीय परंपराओं और मूल्यों को प्रतिबिंबित किया।
अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण के वैचारिक आधारों में वे तंत्र शामिल हैं जो राज्य (State) के अनुपालन का आकलन करते हैं, उल्लंघनों की पहचान करते हैं और पीड़ितों को मुआवजा (reparations) प्रदान करते हैं। इस ढांचे का एक मूल सिद्धांत यह है कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार पूरक या सहायक (subsidiary) है; मानवाधिकारों की रक्षा करने की प्राथमिक जिम्मेदारी स्वयं राज्यों की है। इसका तात्पर्य यह है कि अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली राष्ट्रीय संरक्षण के एक पूरक के रूप में कार्य करती है, और इसके लिए पहले घरेलू उपचारों (domestic remedies) का पूरी तरह इस्तेमाल कर लिया जाना अनिवार्य है। ये संरक्षण प्रणालियाँ मुख्य रूप से तीन तंत्रों पर निर्भर करती हैं: न्यायालयों के समक्ष व्यक्तिगत शिकायतों के लिए याचिका प्रणाली (petition systems), समय-समय पर राज्य अनुपालन की समीक्षा के लिए रिपोर्टिंग प्रणाली (reporting systems), और घटना स्थल पर जाकर डेटा एकत्र करने के लिए जांच प्रक्रियाएं (investigative procedures)।
क्षेत्रीय प्रणालियाँ स्थानीय माँगों को अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करने में सक्षम हैं, और वे इस बुनियादी नियम के तहत काम करती हैं कि सभी प्रणालियों में पीड़ित के लिए जो सबसे अनुकूल नियम (norm) होगा, वही मान्य होगा। इन तीनों क्षेत्रीय प्रणालियों का अपना एक अनूठा इतिहास और ढांचा है। यूरोपीय प्रणाली सबसे पुरानी क्षेत्रीय प्रणाली है, जो मानवाधिकारों पर यूरोपीय कन्वेंशन (European Convention on Human Rights) द्वारा संचालित है और यह 1953 से लागू है। द्वितीय विश्व युद्ध के अत्याचारों के जवाब में एकता और साझा मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए विकसित इस प्रणाली ने 1991 में 'प्रोटोकॉल नंबर 11' के माध्यम से एक मील का पत्थर हासिल किया, जिसने पुराने आयोग को समाप्त कर दिया और व्यक्तियों को सीधे स्ट्रासबर्ग (फ्रांस) में स्थित स्थायी न्यायालय में याचिका दायर करने का अधिकार दे दिया। परिणामस्वरूप, मानवाधिकारों पर यूरोपीय न्यायालय (ECTHR) के समक्ष मौखिक पैरवी (oral advocacy) पीड़ितों को किसी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखने का पहला अवसर प्रदान करती है, जो मानवाधिकार मुक़दमेबाजी के इतिहास में एक ऐतिहासिक बदलाव है।
अफ्रीकी प्रणाली सबसे नया ढांचा है, जिसका विकास 1980 के दशक के बाद से हुआ है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें उपनिवेशवाद से मुक्ति (decolonisation), आत्मनिर्णय के संघर्षों और स्थानीय सभ्यता के मूल्यों से गहराई से जुड़ी हैं, जो आज भी इस प्रणाली के समक्ष मौखिक पैरवी की रणनीतियों के केंद्र में हैं। इसके मुख्य दस्तावेजों में अफ्रीकी संघ (African Union), बंजुल चार्टर (Banjul Charter - मानवाधिकारों और लोगों के अधिकारों पर अफ्रीकी चार्टर), और मानवाधिकारों और लोगों के अधिकारों पर अफ्रीकी न्यायालय शामिल हैं। अफ्रीकी न्यायालय के पास सलाहकारh (advisory) और विवादित (contentious) दोनों तरह के क्षेत्राधिकार हैं, हालांकि इसके विवादित क्षेत्राधिकार के लिए बंजुल चार्टर की व्याख्या और अनुप्रयोग पर संबंधित राज्य की स्पष्ट स्वीकृति होना अनिवार्य है।
इंटर-अमेरिकन प्रणाली ऐतिहासिक रूप से तानाशाही शासनों और नागरिक संघर्षों से प्रभावित रही है, और इसका विकास लंबे समय तक तानाशाही सरकारों, गृह युद्धों और राज्यों के बीच आपसी संवाद की कमी के कारण बाधित रहा, जिससे क्षेत्रीय आम सहमति बनाना विशेष रूप से कठिन हो गया था। इस प्रणाली के बुनियादी दस्तावेजों में 'अमेरिकन डिक्लेरेशन ऑफ द राइट्स एंड ड्यूटीज ऑफ मैन', 'चार्टर ऑफ द ऑर्गेनाइजेशन ऑफ अमेरिकन स्टेट्स', 'अमेरिकन कन्वेंशन ऑन ह्यूमन राइट्स' और 'प्रोटोकॉल ऑफ सैन साल्वाडोर' शामिल हैं। यह प्रणाली दो मुख्य निकायों में विभाजित है: इंटर-अमेरिकन कमीशन (IACHR) और इंटर-अमेरिकन कोर्ट। इंटर-अमेरिकन कमीशन, जिसका मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. में है, मानव अधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के साथ-साथ याचिकाओं को स्वीकार करता है (admissibility) और उनके गुण-दोषों की भी जांच करता है। IACHR के समक्ष पीड़ित या उनके परिवार के सदस्य याचिका दायर कर सकते हैं, बशर्ते वे इसकी मुख्य (स्वीकार्यता) शर्तों को पूरा करते हों: जैसे घरेलू उपचारों का पूरी तरह प्रयोग हो चुका हो, याचिका छह महीने की समय vo/kh esa दी गई हो, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्यवाही की पुनरावृत्ति न हो रही हो, और सारवान साक्ष्य मौजूद हों। दूसरी ओर, इंटर-अमेरिकन कोर्ट 1979 से सैन जोस, कोस्टा रिका में स्थित है और यह अमेरिकन कन्वेंशन की व्याख्या और उसे लागू करने का काम करता है। पीड़ितों की वकालत और मुआवजे के संदर्भ में एक क्रांतिकारी बदलाव सन 2001 के प्रक्रियात्मक सुधार के माध्यम से आया, जिसने व्यक्तियों और उनके प्रतिनिधियों को सीधे न्यायालय के समक्ष भाग लेने की अनुमति दी। इसने एक महत्वपूर्ण नवाचार को जन्म दिया: जब स्थानीय न्यायालय प्रभावी राहत देने में असफल रहते हैं, तो पीड़ित अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण की मांग कर सकते हैं, बशर्ते घरेलू उपचार स्थानीय न्यायालय समाप्त हो चुके हों और संबंधित राज्य न्यायालय के क्षेत्राधिकार को मान्यता देता हो।
निष्कर्ष के रूप में, क्षेत्रीय मानवाधिकार न्यायालयों की स्थापना न केवल रणनीतिक मुक़दमेबाजी की संभावना को बढ़ाती है, बल्कि राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार के अप्रभावी या त्रुटिपूर्ण होने पर अधिकारों को वास्तव में लागू करने का जरिया भी बनती है। अंतर्राष्ट्रीय मुक़दमेबाजी अब सभी क्षेत्रीय प्रणालियों में एक स्थापित वास्तविकता बन चुकी है, जहाँ प्रत्येक प्रणाली अपनी विशिष्ट प्रक्रियाओं के साथ काम करती है चूंकि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार अनुपूरकता और पूरकता (subsidiarity & complementarity) के सिद्धांत पर काम करता है, इसलिए यह मानवाधिकार संरक्षण के लिए राज्य की जिम्मेदारी को बदलने के बजाय उसे और मजबूत करता है। अंततः, घरेलू उपचारों के विफल हो जाने पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों के समक्ष मौखिक पैरवी पीड़ितों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक साधन बन गई है। डा0 सुदेशना द्वारा प्रोफेसर प्रिसिला कैनेपारो को धन्यवाद ज्ञापित किया गया। इस कार्यक्रम में संस्थान के शिक्षक एवं विधार्थी उपस्थिति रहें।

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