रितिका एक समझदार और होनहार शिक्षिका थीं। पिछले कुछ समय से उन्हें सौम्या की हरकतों पर संदेह होने लगा था। वह बार-बार फोन और संदेश करके कहती, “मैम, आज इसने आपके बारे में यह कहा...”
“मैम, उसने आपके लिए वह बोला...” लेकिन रितिका हर बात को धैर्य और समझदारी से लेती रहीं।
सौम्या मीठे और धीमे लहज़े में इतनी सलीके से बात करती कि पहली नज़र में लगता, उससे अधिक संस्कारी शायद ही कोई हो। पर न जाने क्यों, वह अपने ही बनाए हीनभावना के बोझ तले दबी रहती थी। उसे हर व्यक्ति में कोई न कोई कमी दिखाई देती और वह दूसरों से उसकी चर्चा भी करती।
धीरे-धीरे रितिका उसे समझाते-समझाते थक गईं और उन्होंने उससे थोड़ी दूरी बनानी शुरू कर दी।
लेकिन एक दिन उन्हें गहरा आघात लगा, जब सौम्या ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर बिना किसी कारण उन्हें सार्वजनिक रूप से बदनाम करने की कोशिश की। लोगों के समझाने पर रितिका ने भी शांत और उचित शब्दों में अपनी बात रख दी।
बाहर से उन्होंने ऐसा जताया जैसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा हो, पर भीतर कुछ टूट गया था।
तीन साल बीत गए, पर आज भी एक आवाज उनके कानों में गूंज जाती है, "आप मेरी अपनी हैं मैम... मैं आपको अपनी शिक्षिका नहीं, बड़ी बहन मानती हूँ।" और हर बार उन्हें लगता, मीठे बोल हमेशा अनमोल नहीं होते, कभी-कभी उनकी कीमत बहुत भारी पड़ जाती है।
—डॉ. शबनम सुल्ताना
लेखिका व फिजियोथैरेपिस्ट


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