पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक युगांतकारी सत्ता परिवर्तन हो चुका है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अपना बहुमत खो चुके हैं, जिससे आम जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह है। किंतु विडंबना यह है कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में हिंसा का जो खूनी स्वरूप दशकों पूर्व व्याप्त था, वह आज भी बदस्तूर जारी है। शासन परिवर्तन का अर्थ केवल चेहरों का बदलना नहीं, बल्कि व्यवस्था का सुधार होना चाहिए, परंतु हालिया चुनाव परिणामों के बाद की तस्वीरें लोकतांत्रिक समाज के लिए गहरी चिंता का विषय हैं।
2021 में नंदीग्राम और 2026 में भवानीपुर से ममता बनर्जी को पराजित करने वाले भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक (पीए) चंद्रनाथ रथ की नृशंस हत्या, राज्य के विभिन्न हिस्सों में आगजनी और हिंसक घटनाएं इस कटु सत्य को उजागर करती हैं कि बंगाल में चुनावी रणभूमि से इतर रक्तरचित खेला अब भी सबसे बड़ी चुनौती है। प्रत्यक्ष है कि राजनीतिक हठधर्मिता, अराजकता अब केवल द्वेष तक सीमित नहीं रही। अभिषेक बनर्जी जैसे नेताओं की पूर्व की चेतावनियों ने समर्थकों के मनोबल को अनियंत्रित किया है। स्थिति इतनी वीभत्स हो चुकी है कि टीएमसी समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया पर युवतियों को जय श्री राम... जैसे गीतों की रील पर सरेआम दुष्कर्म की धमकियां दी जा रही हैं। यह स्पष्ट करता है कि वहां कानून का नहीं, बल्कि भय का साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि जनता में यह संदेश जाए कि भाजपा की नई व्यवस्था उन्हें सुरक्षा देने में समर्थ नहीं है।
लोकतंत्र में हार-जीत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु बंगाल का वर्तमान परिदृश्य विचलित करने वाला है। ममता बनर्जी जनादेश को स्वीकार करने के बजाय संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रख रही हैं। बहुमत खोने के बावजूद उनका इस्तीफा देने राजभवन न जाना उनकी नकारात्मक मंशा को दर्शाता है। वे चाहती हैं कि राज्य में अराजकता फैले और राष्ट्रपति शासन लगे, ताकि वे अपनी विफलता को विक्टिम कार्ड के पीछे छिपा सकें। इतनी क्रूर मानसिकता और संविधान की शपथ लेकर लोकतांत्रिक परंपराओं का अपमान करना किसी भी दृष्टि से उचित निर्णय नहीं है। यह सीधे तौर पर जनता के जनादेश का तिरस्कार है।
बंगाल का इतिहास गवाह है कि यहां सत्ता का मार्ग अक्सर खूनी संघर्ष से ही गुजरता है। चाहे सत्तर के दशक का नक्सलबाड़ी आंदोलन हो, वामपंथियों का 34 वर्षों का कठोर शासन (जिसमें मरीचझापी जैसे नरसंहार हुए) हो या वर्तमान तृणमूल का दौर; विरोधियों को शारीरिक रूप से समाप्त करने की प्रवृत्ति यहां के राजनीतिक डीएनए में घुल गई है। चंद्रनाथ रथ की हत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि एक रणनीतिक प्रहार है जिसका उद्देश्य विपक्ष के मनोबल को कुचलना है। उत्तर प्रदेश के मंत्री ओमप्रकाश राजभर का यह तर्क सटीक है कि बंगाल की तानाशाही को मिटाने के लिए ही जनता ने भाजपा को भारी जनादेश दिया है, किंतु प्रश्न यह है कि क्या नई व्यवस्था उन तत्वों पर लगाम लगा पाएगी जिन्हें दशकों से सत्ता का संरक्षण प्राप्त रहा है?
भाजपा के लिए विकास का मार्ग कांटों भरा है। जब प्रशासनिक तंत्र और पुलिस बल राजनीतिक प्रतिशोध के मूकदर्शक बन जाएं, तो भारी निवेश और बुनियादी ढांचे का विकास गौण हो जाता है। बंगाल का वर्तमान मॉडल 'स्ट्रीट फाइट' पर टिका है, जहां हार को न पचा पाने की कुंठा अराजकता को जन्म देती है। ऐसे में विपक्ष में बैठी पराजित शक्तियां विकास के पहिए को बाधित करने का हर संभव प्रयास करेंगी। भाजपा को समझना होगा कि यहां केवल जनकल्याणकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं; असली परीक्षा उन्हें एक सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण में क्रियान्वित करने की है।
इस विकट परिस्थिति में सरकार को प्रशासन का वि-राजनीतिकरण करना होगा। जब तक थाना स्तर पर अधिकारी दल विशेष के प्रति वफादार रहेंगे, हिंसा का यह तांडव नहीं रुकेगा। कार्यकर्ताओं को सुरक्षा का अभय कवच प्रदान करना और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सांप्रदायिक तनाव या धमकियां देने वाले तत्वों पर बिना किसी तुष्टिकरण के कठोरतम कानूनी प्रहार अनिवार्य है।
अंततः, बंगाल की प्रबुद्ध जनता को आत्ममंथन करना होगा कि क्या सोनार बांग्ला का स्वप्न हिंसा की राख पर साकार हो सकता है? अराजकता, असामाजिकता से प्रदेश का ही भविष्य नष्ट होता है। यदि मतभेदों का फैसला गोलियों से होता रहा, तो उद्योग जगत फिर से पश्चिम बंगाल के पास नहीं जाएगा और फेक्ट्रियां बंद पड़ी रहेगी और युवा पलायन को मजबूर होंगे। जनता को उन चेहरों को पहचानना होगा जो अपनी राजनीति के लिए समाज में वैमनस्य घोल रहे हैं। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को स्वीकारते हुए सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभानी होगी। यदि अशांति का यह दौर नहीं थमा, तो इतिहास उन्हें एक ऐसे नेतृत्व के रूप में याद रखेगा जिसने सत्ता के मोह में अपने ही प्रदेश को हिंसा की आग में झोंक दिया। वहीं, कानून का राज स्थापित करना भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
— सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'
मध्यप्रदेश संपादक, नित्य संदेश


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